झारखण्ड पॉलिटिक्स: स्थानीयता के हमाम में सब नंगे हैं
झूठ, फेरब, साजिश, मक्कारी, विश्वासघात, आश्वासन भारतीय राजनीति का नंगा सच है। सिर्फ सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी ही नहीं बल्कि विपक्षी पार्टियां भी इस नंगे सच सौदागर होती हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष यह खेल खुले आम खेलते हैं और वह भी बेशर्मी के साथ खेलते है, इन्हें कोई चिंता नहीं होती है कि उनके ऐसे खेल से उनकी ही जगहंसाई होती है, वे ही जनचिंता की परिधि में कैद होते हैं।
जैसे-जैसे हमारा लोकतंत्र. दीर्घायु होता जा रहा है वैसे-वैसे लोकतांत्रिक राजनीति में झूठ, फेरब, मक्कारी, विश्वासघात और आश्वासन जैसे हथकंडे जनता के लोकतांत्रिक अधिकार और विकास की बुनियादी जरूरतों पर प्रहार कर रहे हैं। सबसे चिंताजनक और उपहासजनक उदाहरण झारखंड राज्य में देखने को मिल रहा है। स्थानीयता के प्रश्न पर सत्ताधारी भाजपा सहित विपक्षी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा और अन्य पाटियां सभी तथ्यागत तौर पर जनता के सामने नंगे हो गये है पर ये सभी स्थानीयता के प्रश्न पर एक-दूसरे को घेरेने, एक-दूसरे पर कीचड उछाड़ने औैर अपना दामन साफ कहने के लिए राजनीतिक बंवडर खड़ा कर दिये हैं। झारखंड की राजनीति में स्थानीयता के प्रश्न पर उठे बंवडर ने जनता के सामने कई प्रश्न खड़े कर दिये हैं। इन प्रश्नों में प्रमुख प्रश्न ये हैं, क्या राजनीतिज्ञों को विपक्ष में रहने के दौरान ही जनचिंता सताती है जब राजनीतिज्ञ सत्ता में होते हैं तब उन्हें जनचिंता होती क्यों नहीं है और स्थानीयता जैसे प्रश्न का हल क्यों नहीं करते हैं, क्या झारखंड निर्माण के लिए बलिदान करने वाले लोगों के सपनों के साथ झारखंड के राजनीतिज्ञ गद्दारी नहीं कर रहे हैं, स्थानीयता के अधूरे प्रश्न से झारखंड के मूल निवासियों का अधिकार और सम्मान का हननं हो रहा है़। पर प्रश्न यह है कि कुंए में ही भांग है तो उम्मीद कैसे और किनसे होगी।
झारखंड राज्य निर्माण के कोई एक या दो साल नहीं बल्कि 16 साल हो गये। इन 16 साल में बाबू लाल मंराडी, अर्जुन मुंडा, शिबू सोरेन, हेमेंत सोरेन, मधु कोड़ा मुख्यमंत्री बने थे, वर्तमान में रधुवर दास मुख्यमंत्री हैं। इन सोलह सालों के दौरान औैर छह-छह मुख्यमंत्रियों के शासनकाल गुजर जाने के बाद भी स्थानीयता प्रश्न हल नहीं हुआ है। इसके लिए क्या सिर्फ वर्तमान मुख्यमंत्री रधुवर दास ही दोषी ठहराये जा सकते हैं, क्या झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बाबू लाल मंराडी दोषी नहीं हैं, क्या झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी को स्थानीयता का प्रश्न हल नहीं कर लेना चाहिए था, झारखंड के आंदोलनकारी शिबू सोरेन और हेमंत सोरेन अपने कार्यकाल में ही स्थानीयता का प्रश्न हल क्यों नहीं किये, क्या भाजपा और झारखंड मुक्ति मोर्चा दोनों सरकारों में शामिल सुदेश महतो द्वारा स्थानीयता का प्रश्न हल नहीं करा लेना चाहिए था। अगर इन सभी ने स्थानीयता के प्रश्न हल नहीं किये तो सीधे तौर पर ये सभी दोषी हैं। ये सभी दोषी हैं पर इनकी चोरी और शिनाजोरी वाली कहावत देखिये। बाबू लाल मंराडी ने धमकी दी है कि अगर स्थानीय नीति जल्द नहीं बनायी जायेगी तो वे राज्य में आर्थिक नाकेबंदी करेंगे, हेमंत सोरेन ने धमकी दी है कि स्थानीय नीति नहीं बनेगी तो फिर वे झारखंड निर्माण आंदोलन से भी बड़ा आंदोलन करेंगे, सुदेश महतो ने भी धरणा-प्रदर्शन कर रहे है। अब बाबू लाल मंराडी, हेमंत सोरेन और सुदेश महतो से कौन पूछेगा कि आपने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में स्थानीय नीति क्यों नहीं बनायी थी? रधुवर दास अभी मुख्यमंत्री है और यह कह रहे हैं कि हम स्थानीय नीति जरूर बनायेंगे पर रधुवर दास स्थानीय नीति बनायेंगे या नहीं, यह नहीं कहा जा सकता है। पर इतना कहा जा सकता है यही रधुवर दास जब विपक्ष में होंगे और जनता इनको खारिज कर देगी तब रघुबर दास भी बाबू लाल मरांडी, शिबू सोरेन हेमंत सोरेन और सुदेश महतो की तरह स्थानीय नीति को लेकर आंदोलन और रार खड़ा करेंगे।
वास्तव में झारखंड की जनता राजनीतिज्ञों और राजनीतिक पार्टियों की उपनिवेशिक नीति की शिकार हुई है। उपनिवेशिक नीति के जनक अंग्रेज थे। अंग्रेजों के पतन और आजादी के बाद भी अंग्रेजों की देन उपनिवेशिक नीति और संस्कृति चलती रही और गरीब व हाशिये पर खडी जनता उपनिवेशिव नीति व संस्कृति से शिकार होती रही है। आजादी के बाद झारखंड की जनता बिहारी उपनिवेशवाद की शिकार रही। लंबी लड़ाई और बेहिसाब बलिदान की कहानी के बाद झारखंड राज्य का निर्माण हुआ था। झारखंड राज्य के निर्माण में केवल आदिवासियों की ही अग्रणी भूमिका नहीं थी बल्कि झारखंड की मूल वासी कुर्मी और तेली-सुड़ी की भी अग्रणी भूमिका थी। शिबू सोरेन से बडी भूमिका बिनोद बिहारी महतो और निर्मल महतो की थी। झारखंड के निर्माण में जो लोग योद्धा कहते थे वही लोग बिहारी उपनिवेशवाद के सामने घुटने टेक दिये, आत्म सर्मपन कर दिये। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि झारखंड बिहारी उपनिवेशवाद का चारागाह बन गया। बिहारी जनता का झारखंड पर आबादी आक्रमण हुआ, बिहारी अपराधी, बिहारी ठेकेदार और बिहारी व्यापारी झारखंड आकर यहां के ठेकेदारी कार्य, और सरकारी नौकरियों पर कब्जा जमा लिये। झारखंड की आदिवासी भूमि पर अवैध कब्जा और अवैध हस्तांरण चरम पर है, मूलवासियों की जमीन और उनकी संपत्ति लूटी जा रही है। जितनी भी सरकारी नौकरियों में नियुक्ति हुई हैं उसमें अधिकतर बिहारी लोगों के हाथ में गयी हैं। खुद हेमंत सरकार ने झारखंड की भाषाओं को बाहर कर बिहारियों द्वारा नौकरियां हड़पने के रास्ते खोले थे। आम धारणा यह है कि अगर स्थानीयता का प्रश्न हल कर लिया होता तो झारखंड की प्रतिभाएं, झारखंड की जनता बिहारी उपनिवेशवाद की शिकार नहीं होती और स्थानीय नौकरियां स्थानीय लोगों के अधीन होती।
संरक्षण की कोई भी नीति सर्वमान्य नहीं हो सकती है, संरक्षण की कोई भी नीति समतामूलक नहीं हो सकती है। पर आधुनिक लोकतंत्र में संरक्षण की नीति प्रमुख स्थान रखती है, संरक्षण को गैर जरूरी नहीं बल्कि जरूरी बताया गया है। भारतीय संविधान में ही नहीं बल्कि दुनिया के कई संविधानों में भी सरंक्षण की नीति की व्याख्या है। भारतीय संविधान में भी आरक्षण और संरक्षण की नीति अंकित हैं। जिन समुदायों और जिन जातियों और जिन क्षेत्रवासियों को सर्वागीन विकास का अवसर नहीं मिला है उन्हें आरक्षण और संरक्षण देकर विकसित करने का सिद्धांत है। हालांकि आरक्षण और संरक्षण को लेकर विरोधाभाषी स्वर भी सुनने को मिलते है।
झारखंड राज्य की बुनियाद ही देशज संस्कृति की रक्षा और स्थानीय लोगों की इच्छाओं का संरक्षण थी। उम्मीद यह थी कि झारखंड राज्य बनने के बाद तरक्की होगी और तरक्की का सीधा लाभ मूलवासियों को मिलेगा, यहां के खनिज धंधों में स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा, सरकारी नौकरियों में स्थानीय लोगों की प्राथमिकता मिलेगी, यहां की संस्कृति देश की अन्य संस्कृृतियों के लिए प्रेरक बनेगी। उम्मीद नाउम्मीदी में तब्दील हो गयी। टाटा, बोकारों स्टील, कोल इंडिया और एचईसी जैसे सरकारी और गैर सरकारी कंपनियां पहले से ही झारखंड की मूलवासियों के लिए खलनायक और शोषण के प्रतीक थी। इन कंपनियों ने झारखंड की जमीन और झारखंड के खनिज से अपना भाग्य जरूर बनायी पर झारखंड की जनता के हाथ भी कुछ नहीं आया। इन कंपनियों की नौकरियां बाहरी लोगों ने लूट ली। झारखंड बनने के बाद जितनी भी सरकारी नौकरियां सृृजित हुई उनमें नाम मात्र के ही मूल निवासियों को जगह मिली। आदिवासी और दलित को आरक्षण की नीति के तहत नौकरियां तो सुलभ हो रही हैं पर राज्य की मूलवासी पिछड़े और अगड़े खासकर बिहारी उपनिवेशवाद से त्राहिमाम कर रहे हैं।
स्थानीयता का प्रश्न झारखंड की जनांकाक्षा है। झारखंड की भाजपा सरकार को नयी स्थानीय नीति हर हाल में बना लेनी चाहिए। स्थानीय कौन माना जायेगा, इस प्रश्न का सर्वमान्य हल निकालना मुश्किल है। पर जमीन सर्वे को आधार बनाना चाहिए, प्राइमरी स्कूल सर्टिफिकेट को मान्य कसौटी पर रखना होगा। अगर स्थानीय नीति इतने दिनों बाद भी नहीं बनेगी तो फिर झारखंड की जनता आगे भी बाहरी उपनिवेशवाद का शिकार होकर अस्तित्व विहीन होने की स्थिति में खडी हो जायेगी।
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