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Showing posts from 2016

हमारा शारिरिक स्वास्थ्य

Dr Rajesh Mahto   हमारा शारिरिक स्वास्थ्य  इस बात पर निर्भर करता है कि हम खाते क्या है ।ठीक इसी प्रकार हमारा मानसिक सोच ,प्रखरता ,दूरदर्शिता और  उर्वरता  इस बात पर निर्भर करता है कि हम पढ...

कुड़मी विवाह नेग नियम

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# # कुड़मी  विवाह नेग नियम ## 💚 💚 💚 💚 💚 💚 💚 💚 💚 💚 1# कुड़मी विवाह मे अमलव खाउआ मे सबसे बाद मे लड़की या लड़के की मां खाती है 2# कुड़मी विवाह मे 18 प्रकार का नेग नियम है  3# कुड़मी विवाह मे हांडी विवाह महुआ विवाह के बाद होता है 4# कुड़मी विवाह मे संमधिन देखा नेग मे कही भी देखे जाने पर गले मिलकर इस नियम को पुरा किया जाता है 5# संगी छाड़ा पैसा नेग विदाई के समय कन्या के दोस्तो को वर की ओर से दिया जाता है 6# कुड़मी चारि के अनुसार भादर फाल्गुन कार्तिक और पुस के महीनो मे विवाह सम्बन्धी बातचीत निषेध होता है 7# सजनी साजा नेग -यह वर पक्ष की और से गांव के महतो के देखरेख मे सम्पन्न होता है इसमे नाना प्रकार की सामग्री जैसे कन्या पक्ष के माॅ मौसी बुआ और धाई के लिए साड़ी और अन्य सामग्री को बांस के बने ड़ाला मे रखा जाता है 8# लग्न बांधा विवाह के तीन दिन पहले सम्पन्न किया जाता है 9# साला धोती कन्या के भाई द्वारा कन्या घर के बाहर द्वार मे सम्पन्न की जाती है 10# बिवाह के समय कन्या घर के लिऐ 160 मिठाई - वरातियो के लिए 120 और महतो के लिए 21 ठो मिठाई की हंड़ी मे पैक करके उन्हे ...

सोहराय_परब

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# सोहराय_परब   सारना धर्मावलंबी किसी भगवान की भी पुजा नही करते है । *सारना धर्म का एक नाम सत्य धर्म भी है ।ये लोग किसी भी ऐसे काल्पनिक भगवान को नही मानते है जिसके अस्तित्व का कोई प्रमाण न हो ।ये लोग केवल सत्य की पुजा (पुजा भी सही शब्द नही है ।पुजा काल्पनिक देवी देवता की होती है सारना धर्मावलंबी अराधना करते है )करते है जिसका अस्तित्व कभी था या है । *सारना धर्म भारत का सर्व प्राचीन धर्म है ।जब सारना धर्म अपनी चरमोत्कर्ष पर थी उस युग को सत्य(सारना ) युग कहा जाता है ।आर्य के आगमन से त्रेतायुग का प्रारंभ माना जाता है । सारना धर्मावलंबी किसी भी काल्पनिक देवी देवता मे विश्वास नही करते है ।वे अपने अराध्य को भूत कहते है ।भूत अर्थात पास्ट ।कहने का मतलब है कि सारना धर्मावलंबी अपने पुर्वज की अराधना(पुजा नही ) करते है ।हर आगन मे भुतपिडहा होता है ।वो हमारे पुर्वज की बेदी होती है इसलिए उसे भुतपिडहा (भूत =पास्ट, पीडहा=बैठने का जगह रहने का जगह )कहा जाता है । *हम हर वर्ष रोहिन के अवसर पर उन खेतो की मिट्टी लाकर भुतपिडहा मे तथा अपने घर के चारो ओर डालते है जिन खेतो की मिट्टी मे हमारे पुर्वज की खुन प...

हमारे एकजुट होने या करने के पिछे हमारा ये स्वार्थ

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हमारे एकजुट होने या करने के पिछे हमारा ये स्वार्थ  :- 1. कुड़मी को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलाना है  ! 2. कुड़मालि भाषा को संविधान की 8वीं अनुसूचि में शामिल कराना है  ! 3. कुड़मालि नेगाचारि में दैनिक पुजा, धरम पुजा, बिहा, मरखि दशकर्म,     गृहप्रवेश आदि शुभकार्य करना है  ! 4. जन्मदिन /सुर्यपुजा (धरम पुजा)/विवाद /गृहप्रवेश /मरखि दशकर्म आदि     के निमंत्रण कार्ड कुड़मालि भाषा में छपवाना है  ! 5. शहीद रघुनाथ महतो, शहीद निर्मल महतो एवं बिनोद बिहारी महतो की     पुण्य तिथि को राजकीय अवकाश घोषित करवाना है  !!

22 सितम्बर बसंत बाबु की पुण्यतिथि

22 सितम्बर बसंत  बाबु  की पुण्यतिथि ------------------   कुड़माली भाषा-साहित्य हित के लिए समर्पित रहे बसंत बाबू ------------------- आर. पी. महतो ----------- झारखंड़ी कुड़मियों के अधिकार व हक के लिए बसंत कुमार वंशरियार का जीवन समर्पित रहा। बसंत बाबू ने अपना सारा जीवन कुड़माली भाषा व साहित्य से सम्बंधित पुस्तक, लेख, कविता आदि के लिए समर्पित कर दिया। बसंत बाबू 22 सितंबर 2011 को दुनिया छोड़कर चल बसे। अपनी अंतिम सांस तक वे कुड़मी जाति व कुड़माली भाषा हित के लिए समर्पित रहे। बसंत बाबू का जन्म तमाड़ के दिंदली गांव में 2 अप्रैल 1929 को एक कृषक परिवार में हुआ था। उनके माता का नाम परिबा महतो व पिता का नाम पम्बल महतो था। उनके रोम-रोम में समाज सेवा की भावना थी। वे परिवार की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए खेतीबारी के साथ पशुपालन के व्यवसाय से जुड़े और समाज के प्रति समर्पित रहे। समाज के प्रति उनकी भावना को देखते हुए उनके पंचायत के लोगों ने दबाव डालकर उन्हें मुखिया का चुनाव लड़ाया और वे मुखिया निर्वाचित हुए। इसके बाद उन्होंने वृहत्तर आदिवासी कुड़मी समाज की स्थापना की और अविभाजित बिहार, बंगाल ...

जहार / जोहार / जहाइर

जहार / जोहार / जहाइर हमारे किसी साथी ने जोहार शब्द का जो अर्थ निकाला है कहाँ तक सटीक है (जो+हारा= जोहार) यानि एक अपमान जनक शब्द  ?? जोहार शब्द का मूल रूप  "जइ+हड़" है आप जानते होंगे हड़ और दिकू का मतलब हड़ > हड़ शब्द की उत्पत्ति हड़प्पा संस्कृति से हुआ है। हम आदिवासी मुलनिवासी कुड़मी समाज हड़प्पा संस्कृति (कुड़ुम गठेक हड़ ) से ताल्लुक रखते हैं इसलिए हमारे अधिकांश शब्द 'ड़' से आता है जैसे : गड़, मुड़, कुड़हाइर, कड़ा, कुड़ुम/कुड़मी ...इत्यादि  ! दिकू : (विदेशी आर्य-ब्राह्मण क्षत्रिय ) हड़+रपा = हड़प्पा बाहरी एवं विदेशी आक्रमणकारियों (आर्य-ब्राह्मण एवं मुगल बादशाह) के द्वारा इस महान संस्कृति को खत्म करने,हड़पने के लिए हमारे पूर्वजों के साथ बार-बार युद्ध हुआ, वे क्रुर योद्धा थे पर हमारे पूर्वज किसान प्रवृत्ति के तो हार का सामना करना पड़ा ! और फिर अपनी जान बचाने के लिए घनघोर जंगलों में घुसते गये एवं बस गए जहाँ इतनी भयानक जंगल में उन आर्य  आक्रमणकारियों का पहुंच पाना संभव नहीं था ! वर्तमान के झारखंड, प.बंगाल और उड़ीसा ( इन्हीं तीनों राज्यों से सटे कुछ असम,बिहार और छत्तीस...

जितिआ (जितुवा)

💐 जितिआ💐 (जितुवा)💐 ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: कुड़मी एवं जनजातिय समुदाय में भादो महीना के शुक्ल पक्ष के तृतीया में"तिज"एकादशी में"करम"एकादशी के बाद अष्टमी में"जितिआ"(जितुवा)परब बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। "तिज" के सात दिन बाद "करम"परब। करम परब के ग्यारह दिन बाद मनाया जाता है:------- 💐 जितिआ"💐 कुड़मी एवं जनजातिय समुदाय के बड़े बुजुर्ग पुर्वापुरूष इसी तरह से दिन,और तिथि का गणना कर परब आगमन का इंतजार के साथ तैयारी करते हैं।इसके लिए कोई पाँजी पूथी का जरूरत नहीं पड़ता है। तीन ईख(आँकडाड़ी)ईकट्ठे जड़ सहित एक साथ बाँधकर आँगन में गाड़ा जाता है,उसके बाद विधि विधान पूर्वक पूजा अर्चना किया जाता है। "तिज" पतिदेव के दीर्घायु,"करम"भाईयों के दीर्घायु,एवं"💐 जितिआ💐"पुत्रों  के दीर्घायु के लिए महिलाएं व्रत एवं उपवास रहकर आर्शिवाद मांगते हैं। इन तीनों परब में जन्म लेने वाले बच्चों का नामकरण भी इसी आधार पर की जाती है। तिज में जन्म लेने पर -तिजन,तिजोपदो,।करम में जन्म लेने पर -करमु...

झारखंड के वाद्य

 नृत्य, गीत और संगीत झारखंड वासियों के प्राण है। सबमें वाद्यों का प्रयोग होता है। वाद्य चार प्रकार के होते हैं- (1) तंतु वाद्य (2) सुषिर वाद्य (3) अवनध्द वाद्य (चमड़े के बने मुख्य ताल वाद्य) और (4) घन वाद्य (धातु के बने सहायक ताल वाद्य)। झारखंड में चारों प्रकार के वाद्य पाये जाते हैं। तंतु वाद्यों में तांत या तारों से आवाज निकलती है। उंगली, कमानी या लकड़ी के आघात से बजाये जाने वाले इन वाद्यों में केंदरी, एक तारा या गुपी यंत्र, सारंगी, टुईला और भूआंग झारखंड में मुख्य हैं और लोकप्रिय भी। उन्हें गीतों के साथ बजाया जाता है और उनसे धुनें भी बनायी जाती हैं। सुषिर वाद्य फूंक कर बजाये जाते हैं। उनमें आड़बांसी या बांसुरी, सानाई, सिंगा, निशान, शंख, मदनभेरी आदि शामिल हैं। उनसे धुन निकाली जाती है। उन्हें गीतों के साथ बजाया भी जाता है। अवनध्द वाद्य मुख्यत: चमड़े के वाद्य हैं। झारखंड में चमड़ा निर्मित वाद्यों की संख्या सबसे अधिक है। उनको ताल वाद्य भी कहा जाता है। उनमें मांदल या मांदर, ढोल, ढाक, धमसा, नगाड़ा, कारहा, तासा, जुड़ी-नागरा, ढप, चांगु, खंजरी, डमरू, विषम ढाकी आदि आते हैं। उनमें मांदर, ढोल, ...

"अपनी संस्कृति अपना पहचान"

आज हम दूसरे समाज की देखा-देखी में इतने उतावले हो गये हैं नकल करने में कि हमें हमारा अपना समाज एवं भाषा-सभ्यता और संस्कृति बहुत छोटा (तुच्छ) महसूस होता है ये उन्हीं लोगों की मानसिकता है जो खुद को समाज का पहुंचा हुआ मानते हैं ! सच कहें तो हमें इस गड्ढ़े में किसी दूसरे धर्म या मिशनरी वालों ने नहीं धकेला बल्कि हम खुद ही कुद पड़े हैं ! टोटेमिक कुड़मी होते हुए भी किसी ने चौधरी तो किसी ने सिंह और किसी ने ओहदार या सिंन्हा लिख डाला ऐसे बहुरूपीये लोग हमारे ही समाज के हैं पर उन्हें लज्जा आती है कुड़मी होने का.. गौर करने वाली बात ये है कि ये लोग कोई गरीब किसान या निरअक्षर नहीं है बल्कि समाज के जाने-माने लोगों में से हैं ! एक तरफ समाज की सामाजिक बातें करते हैं दूसरे तरफ समाज बिरोधी काम भी करते हैं जबकि ऐसा दुर्साहस हमारे गरीब/ अल्पशिक्षित परिवार के कुड़मी भाई कभी नहीं कर सके ! जिन्हें अपनी भाषा-सभ्यता और संस्कृति से प्यार नहीं या गर्व नहीं उन्हें सामाजिक बातें करने में शोभा नहीं देता  ! हमारे फेसबुक में ऐसे हजारों मित्रता अनुरोध (friend Request) पड़ा हुआ है जिसमें टोटेमिक कुड़मी होने की पह...

बिनअद बिहारि माहतअ

बिनअद बिहारि माहतअ उ-बेरिआक जिला मानभुम, परगना झरिआ, बालिआपुरेक बड़ादाहा बसागतें बाबुक जनम 23.09.1921 सालें। एखरा मानगर हरि काड़उआरेक नाति रहला। एखर माञ बाप रहत, मनदाकिनि आर महिनदर माहतअ।   एखर बाप अना गरिब चासा पहली बेजाञ कसटअ आर भजअकटअ मांखिकुन, लेधेड़-पस पसिकुन, दिन काटेइहेला। बिनअद बाबुक भुञपाठेक उचरेइन हेइक कुसमाटाँड़ इसकुले। उ बेरिआञ पड़हे- लिखते तेहे पथि, कागज-पेनसिल कर भारु टान, रहलेइक तेहें, जन टा जखन दरकार उटा जहाड़ करि छउआके देइ-हेलथिक। बालिआपुर इसकुल लें मिडिल पास , आर धानबाइद हाइ इसकुल लें मेटरिक पास करला। उ खनें मटर गाड़ी आर साइकेलेक चलन बेसी नेखलेइक। बिनअद बाबु दिनाम सात कस चलिकुन इसकुल जाइ हेला, ताउ मने कनअ कातर नि रहलेइक । मेटरिक पास करल परें चुनाउ विभागें कामें खंजाला । मेनेक , इठिन मन नि भरलेइक । डि सि आफिसे किरानिक कामें खंजाला । इहॉउ मन नि लागलेइक । नकरि - चाकरि छाड़िकुन कलेजें भरति हेला । आइ ए बि ए आर बि एल पास करिकुन 1956 सालें धानबाइद कटें उकालाति सुरु करला । मेनतुक उकलातिञ धिआन रहलेइक कम, समाज आर राजनिति लेइकुन भाभना - चिनता रहलेइक बेसि।   ...

झारखण्ड पॉलिटिक्स: स्थानीयता के हमाम में सब नंगे हैं

झूठ, फेरब, साजिश, मक्कारी, विश्वासघात, आश्वासन भारतीय राजनीति का नंगा सच है। सिर्फ सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी ही नहीं बल्कि विपक्षी पार्टियां भी इस नंगे सच सौदागर होती हैं...

झारखण्ड पॉलिटिक्स: स्थानीयता के हमाम में सब नंगे हैं

झूठ, फेरब, साजिश, मक्कारी, विश्वासघात, आश्वासन भारतीय राजनीति का नंगा सच है। सिर्फ सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी ही नहीं बल्कि विपक्षी पार्टियां भी इस नंगे सच सौदागर होती हैं...