"अपनी संस्कृति अपना पहचान"

आज हम दूसरे समाज की देखा-देखी में इतने उतावले हो गये हैं नकल करने में कि हमें हमारा अपना समाज एवं भाषा-सभ्यता और संस्कृति बहुत छोटा (तुच्छ) महसूस होता है ये उन्हीं लोगों की मानसिकता है जो खुद को समाज का पहुंचा हुआ मानते हैं !
सच कहें तो हमें इस गड्ढ़े में किसी दूसरे धर्म या मिशनरी वालों ने नहीं धकेला बल्कि हम खुद ही कुद पड़े हैं ! टोटेमिक कुड़मी होते हुए भी किसी ने चौधरी तो किसी ने सिंह और किसी ने ओहदार या सिंन्हा लिख डाला ऐसे बहुरूपीये लोग हमारे ही समाज के हैं पर उन्हें लज्जा आती है कुड़मी होने का.. गौर करने वाली बात ये है कि ये लोग कोई गरीब किसान या निरअक्षर नहीं है बल्कि समाज के जाने-माने लोगों में से हैं !
एक तरफ समाज की सामाजिक बातें करते हैं दूसरे तरफ समाज बिरोधी काम भी करते हैं जबकि ऐसा दुर्साहस हमारे गरीब/ अल्पशिक्षित परिवार के कुड़मी भाई कभी नहीं कर सके !
जिन्हें अपनी भाषा-सभ्यता और संस्कृति से प्यार नहीं या गर्व नहीं उन्हें सामाजिक बातें करने में शोभा नहीं देता  !

हमारे फेसबुक में ऐसे हजारों मित्रता अनुरोध (friend Request) पड़ा हुआ है जिसमें टोटेमिक कुड़मी होने की पहचान नहीं या दूसरे समुदाय से हैं या जिनमें अपने नाम के साथ सिर्फ कुमार या कुमारी लिखा है उन्हें हम कुड़मी भी नहीं मानते या अपने मित्रता के काबिल नहीं समझते  !

हमारी बातें कड़वी हो सकती हैं पर हमारे लक्ष्य आप समझ सकते हैं  !! जहार, धन्यवाद

"अपनी संस्कृति अपना पहचान"

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