जहार / जोहार / जहाइर
जहार / जोहार / जहाइर
हमारे किसी साथी ने जोहार शब्द का जो अर्थ निकाला है कहाँ तक सटीक है (जो+हारा= जोहार)
यानि एक अपमान जनक शब्द ??
जोहार शब्द का मूल रूप "जइ+हड़" है
आप जानते होंगे हड़ और दिकू का मतलब
हड़ > हड़ शब्द की उत्पत्ति हड़प्पा संस्कृति से हुआ है। हम आदिवासी मुलनिवासी कुड़मी समाज हड़प्पा संस्कृति (कुड़ुम गठेक हड़ ) से ताल्लुक रखते हैं इसलिए हमारे अधिकांश शब्द 'ड़' से आता है जैसे : गड़, मुड़, कुड़हाइर, कड़ा, कुड़ुम/कुड़मी ...इत्यादि !
दिकू : (विदेशी आर्य-ब्राह्मण क्षत्रिय )
हड़+रपा = हड़प्पा
बाहरी एवं विदेशी आक्रमणकारियों (आर्य-ब्राह्मण एवं मुगल बादशाह) के द्वारा इस महान संस्कृति को खत्म करने,हड़पने के लिए हमारे पूर्वजों के साथ बार-बार युद्ध हुआ, वे क्रुर योद्धा थे पर हमारे पूर्वज किसान प्रवृत्ति के तो हार का सामना करना पड़ा ! और फिर अपनी जान बचाने के लिए घनघोर जंगलों में घुसते गये एवं बस गए जहाँ इतनी भयानक जंगल में उन आर्य आक्रमणकारियों का पहुंच पाना संभव नहीं था ! वर्तमान के झारखंड, प.बंगाल और उड़ीसा ( इन्हीं तीनों राज्यों से सटे कुछ असम,बिहार और छत्तीसगढ़ में भी हैं) में नदी किनारे खेती करने के उद्देश्य से कबीले बनाकर रहने लगे ! कहावत है "जेंदे-जेंदे पानिक सत, तेंदे-तेंदे कुड़मीक जत" आपने देखा होगा इन्हीं गिने-चुने राज्य में ही आदिवासी कुड़मी समुदाय मिलेंगे बाकी राज्यों में नहीं और जहाँ-जहाँ कुड़मी समुदाय है वहाँ-वहाँ कल,साँउताल, हो, मुन्ड़ा, भूमिज आदि जनजाति मिलेंगे एवं उनके पुजा-पाठ, रहन-सहन, परब-त्यौहार में भी काफी समानता रहा है ।
जोहार का अभिवादन संथालों में सदियों से एक ही रहा है पर हम कुड़मी समुदाय बाहरी संस्कृति के प्रभाव से भटक गये थे जोहार का दूसरा अर्थ जइ+हर (संथाली में कछुआ को हरअ: कहते हैं) होता है।
मान्यता है कि कछुआ से हमारा सदियों से नाता है। कुछ लोग कछुआ को मारते नही एवं खाते हैं तो कुछ लोग इसे पूजते हैं। बुढे-बुजुर्गों से सुनी कथन अनुसार कछुआ से हमें पानी के किनारे जमीन को समतल करने का Idea मिला था, जब हमारे पूर्व पुरूस शिकारी जीवन जीते थे इसलिए भी कछुआ को बहुत सम्मान दिया जाता है।
जोहार, धन्यवाद
: उत्तम कुमार केसरिआर
हमारे किसी साथी ने जोहार शब्द का जो अर्थ निकाला है कहाँ तक सटीक है (जो+हारा= जोहार)
यानि एक अपमान जनक शब्द ??
जोहार शब्द का मूल रूप "जइ+हड़" है
आप जानते होंगे हड़ और दिकू का मतलब
हड़ > हड़ शब्द की उत्पत्ति हड़प्पा संस्कृति से हुआ है। हम आदिवासी मुलनिवासी कुड़मी समाज हड़प्पा संस्कृति (कुड़ुम गठेक हड़ ) से ताल्लुक रखते हैं इसलिए हमारे अधिकांश शब्द 'ड़' से आता है जैसे : गड़, मुड़, कुड़हाइर, कड़ा, कुड़ुम/कुड़मी ...इत्यादि !
दिकू : (विदेशी आर्य-ब्राह्मण क्षत्रिय )
हड़+रपा = हड़प्पा
बाहरी एवं विदेशी आक्रमणकारियों (आर्य-ब्राह्मण एवं मुगल बादशाह) के द्वारा इस महान संस्कृति को खत्म करने,हड़पने के लिए हमारे पूर्वजों के साथ बार-बार युद्ध हुआ, वे क्रुर योद्धा थे पर हमारे पूर्वज किसान प्रवृत्ति के तो हार का सामना करना पड़ा ! और फिर अपनी जान बचाने के लिए घनघोर जंगलों में घुसते गये एवं बस गए जहाँ इतनी भयानक जंगल में उन आर्य आक्रमणकारियों का पहुंच पाना संभव नहीं था ! वर्तमान के झारखंड, प.बंगाल और उड़ीसा ( इन्हीं तीनों राज्यों से सटे कुछ असम,बिहार और छत्तीसगढ़ में भी हैं) में नदी किनारे खेती करने के उद्देश्य से कबीले बनाकर रहने लगे ! कहावत है "जेंदे-जेंदे पानिक सत, तेंदे-तेंदे कुड़मीक जत" आपने देखा होगा इन्हीं गिने-चुने राज्य में ही आदिवासी कुड़मी समुदाय मिलेंगे बाकी राज्यों में नहीं और जहाँ-जहाँ कुड़मी समुदाय है वहाँ-वहाँ कल,साँउताल, हो, मुन्ड़ा, भूमिज आदि जनजाति मिलेंगे एवं उनके पुजा-पाठ, रहन-सहन, परब-त्यौहार में भी काफी समानता रहा है ।
जोहार का अभिवादन संथालों में सदियों से एक ही रहा है पर हम कुड़मी समुदाय बाहरी संस्कृति के प्रभाव से भटक गये थे जोहार का दूसरा अर्थ जइ+हर (संथाली में कछुआ को हरअ: कहते हैं) होता है।
मान्यता है कि कछुआ से हमारा सदियों से नाता है। कुछ लोग कछुआ को मारते नही एवं खाते हैं तो कुछ लोग इसे पूजते हैं। बुढे-बुजुर्गों से सुनी कथन अनुसार कछुआ से हमें पानी के किनारे जमीन को समतल करने का Idea मिला था, जब हमारे पूर्व पुरूस शिकारी जीवन जीते थे इसलिए भी कछुआ को बहुत सम्मान दिया जाता है।
जोहार, धन्यवाद
: उत्तम कुमार केसरिआर
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