"सोशल मीडिया के सभी साथियों को धन्यवाद और जोहार"

जोहार बुड़हाबाबा ,जोहार महामाञ

"सोशल मीडिया के सभी साथियों को धन्यवाद और जोहार"

मेरा नाम दयामय बानुआर है,  सोशल मीडिया के जरिए ही मैं जनवरी 2016 से समाज के लोगों के साथ जुड़ा और अपने कुड़मि समाज के बारे में बहुत सारी जानकारी मिली । मुझे अपने समाज के बारे में जो भी जानकारी मिली वही सही है कि गलत इसकी सत्यता जानने के लिए मैं जब अपने आपको​ बचपन में ले जाता हूं समाज के बुद्धिजीवियों द्वारा बताई गई सभी बातें सच लगने लगती है।
मेरा घर बोकारो जिला के भण्ड्रो गांव में है। मेरे गांव के आस पास के सभी गांवों में कुड़मि लोग ही रहते है। मुझे अच्छी तरह याद है मेरे गांव में 1995 से पहले कोई मुर्ती पुजा (सरस्वती पूजा, काली पूजा....) नहीं​ होती थीं , अब हो रही है। हम-लोग बचपन में दुर्गा पूजा, काली पुजा का मेला देखने बगल के गांव कुरा (जहां बंगाली लोग रहते हैं) वहां देखने जाते थे। उस समय सोचता था कि हम-लोग के गांव में ऐसा पुजा क्यों नहीं होता है, न ही मेरे दादा दादी इस तरह के पुजा में कोई बकरा या कुछ काटते थे। हाँ लेकिन गर्मी के दिनों में महाभारत तथा रामायण की कथाएं जरुर होती थीं। सोचने वाली बात है कि ये सब कौन करवाता था, हम-लोग यदि हिंदू होते तो हमारे सभी पुर्वजों की रामायण महाभारत की अच्छी तरह जानकारी होती। कुछ लोग कहेंगे कि पुर्वज लोग अनपढ़ थे इस कारण जानकारी नहीं थी महाभारत रामायण के बारे में। लेकिन सोचने वाली बात है पुर्वज लोग अनपढ़ होने के बावजूद इतना बड़ा नेगचारी कैसे बना लिए। जब हमारे पुर्वज लोग​ जब जाहराथान , ग्रामथान के लिए एक अलग जगह चिन्हित कर के रखे हैं तो काली पुजा दुर्गा पूजा के लिए क्यों नहीं। ऐसा इसलिए कि हम-लोग हिंदू धर्म के नहीं "सारना धर्म" के हैं
सारना शब्द आया है सत्य से , हम-लोग सत्य धर्म के हैं । सत्य के सिवा झुठ की पुजा हम-लोग करते नहीं। हम-लोग प्रकृति पुजक हैं जिसको कुड़मालि में  परकिति कहते हैं, परकिति या प्रकृत्य मतलब सत्य । हमारे  पुर्वज लोग जो नेग नीति कर के गऐ है उसमें प्रत्येक में विशुद्ध तर्क एवं विज्ञान की झलक है अर्थात सत्यता/वास्तविकता व्याप्त है कोई अनुठा या झूठा नहीं । जैसे हम-लोग माघ मास में आखाइन जातरा करते हैं उसमें माटी की पुजा करते हैं तो सत्य रुप से मिट्टी का ही पुजा करते हैं।
आप बोकारो धनबाद में ज्यादा नहीं 15-20 साल पिछे जाएंगे तो देखेंगे जितने भी कुड़मि गांव है किसी गांव के किसी आंगन में हनुमान का झंडा नहीं था । लेकिन बिहारी के देखा देखी हम-लोग अपने घर-आंगन में बांस गाड़ लिए।
अब सवाल ये है कि क्या हमारे समाज में जागरूकता के बाद इस साल वो झंडा सब रहेगा या उखड़ेगा ??
गौर करने वाली बात तो ये है कि मुर्ती पुजा हमारी संस्कृति में नहीं है, क्योंकि हमारे पुर्वज लोग चाहते तो जाहराथान में बढिया सा विभिन्न मूर्तियां बनाकर, मंदिर नुमा काल्पनिक ढाँचा बनाकर मनगढ़ंत कहानी जोड़ सकते थे , पर उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया जो हमारे नेगाचारि के खिलाफ हो सिर्फ वहां पेड़ के नीचे एक जिंदा पत्थर गाड़ा हुआ मिला। पुर्वज लोग क्या मुर्ती बना नहीं पाते , हमारे पुर्वजों के पास इतना दिमाग था की पत्थर को काट कर मुर्ती बना के रख देते ।

मुर्ती पुजा हमारे समाज के लिए कितना अच्छा है या बुरा आपलोग थोड़ा सोच के देखिये। एक मुर्ती बनाने में कम से कम पांच खांची मिट्टी लगता है। एक गांव के सभी पुजा मिला कर कम से कम 15 से 20 मुर्तीयों का पुजा किया जाता है। मुर्ती का पुजा करके वहीं किसी तलाब में विशर्जन करना होता है तो हर साल तलाब में इतना मिट्टी जाएगा ?? आश्चर्य न हों ऐसे में वो तलाब कितना साल तक बचेगा सोचने वाली बात है। वहीं मुर्ती में जो chemical colour पानी में जाता है तो पानी भी जहरीला हो जाता है जिसके कारण मछलियों में बीमारी एवं उस पानी को पिने वाले मवेशी बीमारियों से ग्रस्त होते हैं ।
तलाब जो हमारा बहुउद्देश्य प्रयोजन से परिपूर्ण हमें सामाजिक, पारिवारिक जीवन एवं व्यवसाय को सहायक है वही हम तलाब को मैदान बनाकर क्या हासिल कर सकते हैं। बैल बकरी विभिन्न जीव- जंतु सभी तलाब के उपर ही आश्रित रह के जीवित रहते हैं।
हमारे कुड़मालि चारि में तो आखइन जातरा "पहला माघ" को मिट्टी काटने का नियम है, उस दिन हमलोग अपने तलाब का दो तीन टोकरी मिट्टी काटकर मेड़ में देते हैं।
गांव के एक तलाब में लगभग 20 अंसीदार लोग होते हैं। यदि 20 अंसीदार अपना नेग पालन करता है तो तलाब से कितनी मिट्टी उठेगा आप सोच सकते हैं ।
हम लोग अपना नेगाचारी को बचाए तो हमलोगो कितना सुखी रहेंगे आप देख सकते हैं।
सिर्फ कुड़मि समाज का ही नहीं बल्कि पुरा मानव समाज को दिशा दिखाने वाला संस्कृति हमारी कुड़मालि संस्कृति है ।
हम अपने आप को बहुत किस्मत वाले समझते हैं कि मेरा जन्म ऐसे महान संस्कृति वाले समाज में हुआ है ।

धन्यवाद, जोहार
दयामय बानुआर

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