प्राग ऐतिहासीक भारतीय संसकृती मे एक विशेष महत्वपुर्ण और अपरिहार्य उत्सव के रूप मे मनाया जाता ह

प्राग ऐतिहासीक भारतीय संसकृती मे एक विशेष महत्वपुर्ण और अपरिहार्य उत्सव के रूप मे मनाया जाता है ।इस त्योहार का वास्तविक स्वरूप मानभूम क्षेत्र मे आज भी विद्यमान है विशेषकर कासाई दामोदर स्वर्णरेखा नदी के आस पास वाले क्षेत्रो मे ।मकर संक्रान्ति के उपलक्ष्य मे पुरे भारतवर्ष मे जितने भी त्योहार मनाऐ डाते है ,लगभग सभी के सभी द्रवीड हड संसकृती के टुसु उत्सव के ही अपभ्रसीत रूप है ।पर बडे दुख की बात है कि भारत की महान द्रवीड सभ्यता काल मे जिस विज्ञान और दर्शन का विकास हो रहा था वर्तमान मे अलौकिक अवैज्ञानिक ब्रह्मनवादी संसकृती के फेर मे पडकर विध्वंस की और अग्रसर हो चुकी है ।टुसु पर्व भी इससे अछुती नही है ।टुसु को देवी कहना या मुर्ती रूप देना या कोई हाड मास की जाती विशेष की कन्या बता उसके साथ मनगढन्त कहानी थोपना इसी अपसंसकृती की ही निशानी है ।
   टुसू उत्सव द्रवीड वंशीय समाज मे खासकर झारखंडी समाज मे पुर्ण धर्मिय संसकार के अनुसार मनाई जाती है ।प्राचीन परंपरा के अनुसार झारखंडी संसकृती मे पहला माध से ही वर्ष का प्रारंभ मानी जाती है ।इसी दिन से झारखंडी नवबर्ष की शुरूआत होती है और मकर संक्रान्ती के दिन होता है वर्ष की समाप्ती या अंत ।सौर वर्ष के अनुसार मकर संक्रान्ति के दिन ही सुर्य अपनी कक्षा मे पृथ्वी से सर्वाधिक दुरी पर पहुच चुकी होती है ।और आखाईन के दिन सर्वोच्च दुरी से पुनः वापस अपनी कक्षा मे मुडती है और धीरे धीरे पृथ्वी से समीप आने लगती है और अननी कक्षा पथ पर बढते हुऐ जब पुनः सुर्य से सर्वाधिक दुरी पर पहुच जाती है तबही होती है वर्ष का अंत अर्थात मकर ।सुर्य का पृथ्वी से सर्वाधिक दुरी से पुनः समीप की और अपनी कक्षा मे यात्रा की शुरूआत ही कहलाती है आखाईन यात्रा ।झारखंडी समाज इसी दिन से अपने कृषी कर्म की शुरूआत करते है ।पृथ्वी और सुर्य की बढते और घटते दुरी के कारण ही मोसम मे परिवर्तन होती है ।
    ।बर्ष की पुर्णता पर सुर्य प्रकाश मे समाहित जो उर्जा हमारे फशलो मे समाहित हो हमारे फसल को परिपक्वता प्रदान करती है और हमारा घर धन धान्य से परिपुर्ण हो उठता है ।जिस शक्ती के उपभोग से हमारा शरीर उर्जावान बनती है बलशाली बनती है ,हमारे फसलो मे अन्न मे समाहित उसी उर्जा और शक्ती की अराधना शष्य देवी या "टुसु "के रूप मे की जाती है ।सुर्य की शक्ती से ही हमे धन धान्य की प्राप्ती होती है , सुर्य के सर्वोच्च दुरी की स्थिति मे पहुचने पर ही हमे धन धान्य की प्राप्ती होती है ।सुर्य के सर्वोच्च शिखर या" टुई"मे सुर्य की उपस्थिति के फलस्वरूप ही हमारे फसल को संपुर्णता प्राप्त होती है हमे धन धान्य की प्राप्ती होती है इसलिए सुर्य या "सु "की शिखर अर्थात "टुई" मे स्थिति के कारण ही इस शक्ति को" टूसु" शक्ति कहा जाता है टुसु नाम से पुकारा जाता है । सुर्य की टुई अर्थात शिखर मे स्थित होने के अवशर पर ही हमे धन धान्य संपन्नता की प्राप्ती होती है जिसे खाकर हमारा शरीर प्राणवान तथा उर्जावान बनती है , सुर्य की शिखर मे स्थिति के अवसर पर ही हमारे फसलो मे जिस प्रणवान उर्जा या शक्ति का संचार होती है उसी सृजनशील और प्रवाण उर्जा को ही टुसु शक्ति  क हा जाता है और उसी शक्ति को टुसु शक्ति के रूप मे श्रद्धा अराधना की जाती है ।
- डॉ राकेश महतो

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