क्या कुड़मी हिन्दू है?

जो आज हिन्दू कहलाते हैं उसे खुद पता नहीं था कि वह हिन्दू है। न ऋग्वेद में न उपनिषद में, न ब्राह्मण में , न रामायण में न गीता में , न महाभारत में एक बार भी हिन्दू शब्द का उल्लेख नहीं है। इसका मतलब हम वास्तव में हिन्दू है ही नहीं। इसका प्रमाण इस बात से भी मिल जाएगा कि आज भी हमारे समाज में रावण , दुर्योधन , घटोत्कच , दुशासन , विभीषण , सुषेण , लंकेश्वर जैसे नाम मिल जाएंगे। क्या इन नामों के व्यक्ति ब्राह्मण , राजपूत या वैश्य समुदाय में मिलने की कल्पना कर सकते हैं। हडिया मुचिया डोमना खोडू चेटरु धुंधा पटला चोटा खेपा मातला रुपु जैसे नाम हर गांव में मिल जाएंगे । पर ये नाम विलुप्त होने के कगार पर है। क्या ऐसे नामों कि कल्पना किसी ब्राह्मण घरों में कर सकते हैं ? धार्मिक विश्वास की बात करते हैं।
क्या कुड़मी हिन्दू है?
ग्राम पूजा , बारि पूजा , रहइन , करम , जितिया , टुसू , सरहुल , सहराई , आखाइन जातरा आदि मनाते है। इनमें से एक भी परबों का उल्लेख रामायण महाभारत गीता उपनिषद अरण्यक ब्राह्मण या वेदों में नहीं हैं। ये कैसे धर्म ग्रंथ हैं जिसमें न तो हमारे धार्मिक विश्वासों को स्थान मिला है और न ही हमारे भूतों को ? भाषा की बात कर लीजिए। सारे ग्रंथ संस्कृत में लिखे गए हैं। आज जब लगभग हर गांव में स्कूल खुल चुके हैं और चारो तरफ हिंदी बोलने वालों की भरमार है फिर भी हर कुडमि गांव के 25-30 प्रतिशत लोग हिंदी नहीं बोल सकते या ये कह सकते हैं कि अनपढ हैं। 100 साल पीछे चला जाए तो यह आंकड़ा शुन्य हो जाएगा। 400 साल पीछे चला जाए तो राम हनुमान ओम शब्द के उच्चारण पर भी प्रतिबंध था, शिक्षा के बारे में सोचना भी पाप माना जाता था। कौन सा धर्म एक ही धर्म को मानने वालों में इतना पक्षपात करता है ? हमारे राज्य में संथाली , मुण्डारी , हो जैसी 8-10 भाषाएँ ऐसी हैं जिनके अपने स्वतंत्र शब्द हैं। देश स्तर पर 25-30 भाषाएँ ऐसी है जिनका स्वतंत्र अस्तित्व है जिनके मौलिक शब्दों में कोई समानता नहीं है। खानपान की बात करते हैं। कुछ लोग शुद्ध शाकाहारी हैं। कुछ लोग शाकाहारी हैं। कुछ लोग सर्वाहारी हैं। कुछ लोग मुर्गा  भेड बकरा  और विभिन्न प्रकार के पक्षियों का मांस खाते हैं तो कुछ लोग पोर्क बीफ और कुत्ते बिल्ली भी खाते हैं। आये दिन खान पान को लेकर मोबलिचिंग की खबरें अखबारों में देखने को मिलती रहती है। ये कैसा धर्म है जो लोगों के खानपान को तय करने का प्रयास करता है। जबकि सभी को पता है कि खान पान भौगोलिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसलिए मैं कह सकता हूँ कि इतना विरोधाभास या ये कह ले कि इतना असमानता होने के कारण हम कभी भी हिन्दू नहीं हो सकते। ये हमारे ऊपर थोपा गया है। अपने पूर्वजों के विश्वास पर टिका रहना किसी प्रकार से गलत नहीं है। और हमारे पूर्वज न तो मूर्ति पूजक थे और न रामायण महाभारत और गीता पढते थे। वे बारह महिने में 13 परब में मास भात खाकर झूमर नटुआ नाच गाकर मस्त रहते थे। मेरा इन परबों में अडिग विश्वास है। और इन परबों और अपने भूतों ( पूर्वजों ) के रहते किसी और पराए धार्मिक विचारों की कोई आवश्यकता नहीं है। रहा सवाल संस्कृति के मिटने का तो जब जब दो संस्कृति में टकराव होगा तो एक को तो मिटना ही होगा। ये शाश्वत सत्य है। हम अपने संस्कृति को बचाने के लिए एकजुट हो रहे हैं। कल तक हम उंगलियों में गिने जा सकते थे । आज हजारों में हैं। आने वाले दिनों में करोडों में होंगे ये विश्वास है हमें। आप को आप की हिंदू संस्कृति का सगुन बानछा , हमको हमारी सारना संस्कृति पर गर्व हैं। जय बुढाबाबा जय महामाञ।

@Nagtuwar Shashi.

Comments

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