कुडमी समाज घोर संक्रमण के दौर से गुजर रही है ।

वर्तमान समय में कुडमी समाज घोर संक्रमण के दौर से गुजर रही है ।लिखित ग्रंथ पुस्तक या सामग्री के अभाव में झारखंडी पर्व त्योहार या सारना धर्म से संबंधित पर्व त्योहार का क्या महत्व है हमलोग जानते ही नहीं हैं ।कोई बाहर खडा आदमी हमारी भाषा संस्कृति इतिहास धर्म के बारे मे जो लिख देता है हम ब्रह्म वाक्य समझ  उसे सिरोधार्य कर लेते हैं ।चुकी हमारे  अपने धार्मिक विश्वास मे ब्रहमनवादी अतिक्रमण हो चुका है और हो रहा है तो वे हमे जो बताते हैं हम  उसे ही अपना लेते हैं ।क्योकि ब्रहमन धर्म के सभी आयोजन तडकभडक  और चकाचौंध भरी होती है जिसके प्रति सहजता से हमलोग  आकर्षित हो जाते हैं ,ऐसी स्थिति में हमारे अपने पर्व त्योहार महत्वहीन  और कम  आकर्षक लगते हैं जिसकारन हम  अपनी भाषा संस्कृति इतिहास धर्म रिति रिवाज परंपरा मान्यता बिश्वास से कटते जा रहे है और बहीरागत संस्कृति  अपनाते जा रहे हैं ।झारखंड में मुर्ती पुजा का इतिहास बहुत पुराना नही है ।झारखंड में पहला दुर्गा पूजा झरीया राज परिवार ने लगभग सो साल पहले सुरू की थी इसी प्रकार झारखंड में पहला सरस्वती पुजा झरीया की रानी जो परघा मे रहती थी ने परघा मे  लगभग सो साल पहले सुरु की थी। अभी भी जंगल के बीच मे परघा सरस्वती मंदिर का भग्नावशेष मौजुद है ।(तत्कालीन झरीया राजा की तीन रानी मे एक परघा एक धैया तथा एक झरीया मे रहती थी )पर झारखंड के बाकि जगह मे मुर्ती पुजा का इतिहास लगभग  साठ से सत्तर साल पुराना है ।जहा तक बजरंगबली झंडा और रामनवमी की पुजा का इतिहास की बात है तो ये कुडमी परिवार में मात्र  दस से पंद्रह साल पुराना है ।वो भी सभी कुडमियो के यहा नही होती है ।याद रखिए कि जब समाज का कोई प्रभावशाली व्यक्ति कुछ भी नया करता है तो बाकी लोग भी तेजी से अनुकरण करने लगते है ।बजरंगबली का जन्म से लेकर पुरा जीवन की कहानी आपके सामने है ।आप खुद सोचिये कि क्या वो हमारे आदर्श या पुजनीय हो सकते है? फिर आप निर्णय ले आपको क्या करना चाहिए और क्या नही ।याद रखिए पानी की बहती धारा में मृत व्यक्ति भी बहते हैं, धारा के बिपरीत दिशा में तैरने की हिम्मत और ज्जवा रखने वाले ही इतिहास बनाते है ।जोहार ।
Dr Rakesh Kumar Mahto

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