कुडमालि संस्कृति के आजीवन प्रचारक माननीय लखीकांत मुतरुवार
कुडमालि भाषाविद् मुलकी कुडमालि बाइसि के अध्यक्ष , बृहत्तर आदिवासी कुडमि समाज के उपाध्यक्ष एवं कुडमालि संस्कृति के आजीवन प्रचारक माननीय लखीकांत मुतरुवार का जन्म 22 अप्रेल 1939 को भंडरो पोस्ट कुरा ज़िला बोकारो मे साधारण किसान परिवार मे हुआ था ।
माननीय मुतरुआर जी बाल्यकाल से ही मेधावी व प्रखर सामाजिक चिंतक थे । इन्होंने 1956 मे मैट्रिक परीक्षा पास की तथा 1959 मे शिक्षक बने । अपने प्रचेष्टा से बाद मे स्मातक की परीक्षा पास की । ये शिक्षण के क्रम मे कई मध्यविधालय मे प्रधानाध्यापक रहे । 30 अप्रेल 1999 को ऐ सेवा निवृत हुए ।�सामाजिक कार्यकर्त्ता के रुप मे ऐ नौकरी जीवन से ही सक्रिय थे लेकिन अवकाश प्राप्त करने के बाद इन्होंने कुडमालि भाषा साहित्य एंव संस्कृति के लिए अपने को समर्पित कर दिऐ । ऐ वैदिक रुढ़ीवाद के खिलाफ थे , सामाजिक बुराइयों तिलक दहेज के ख़िलाफ़ भी आवाज़ बुलंद की । पारम्परिक कुडमालि रीति रिवाजों को स्थापित करने के लिए कुडमालि नेगाचारी से अपने माता पिता का मरखि एंव अपने बेटा बेटियों की शादी कराई ।�ऐ सामाजिक कार्यकर्त्ता के साथ साथ शिक्षा प्रेमी भी थे एंव नारी शिक्षा के प्रबल पक्षधर थे । नारी शिक्षा को आगे बढ़ाने के लिए अपने ही ज़मीन अपने गॉव मे बालिका विधालय की स्थापना की ।�इसी क्रम मे झारखंड प्रदेश मे स्थानीय भाषा शिक्षा आन्दोलन को खड़ा करने मे अग्रणी भूमिका निभायी। अपनी मातृभाषा कुडमालि के उत्थान , संरक्षण व संवर्द्धन मे ऐ मुखर रहे । इनकी मुखरता को नया आयाम मिला ।�झारखंड मे जब भाषा आंदोलन की बात चली तो ऐ कुडमालि भाषा को स्थापित करने मे तन मन धन से सक्रिय हुए । 1980 मे जब डॉ कुमसर सुरेस सिंह राँची के कमिश्नर सह प्रतिकुलपति थे तब रॉची विश्वविघालय मे जनजातिय एंव क्षेत्रीय भाषाओं के लिए अलग पीजी विभाग की स्थापना की बात आई और भाषाओं के लिए परामर्श दातृ समिति गठन की बात हुई तो निर्णय हुआ लखीकांत मुतरुआर जी कुडमालि के परामर्शदातृ समिति मे रहेंगे ।�1982 मे भाषा संपादकीय समिति का गठन हुआ जिसमें लखीकांत मुतरुआर डॉ शशिभूषण महतो प्रो एच एन सिंह थे । इसी वर्ष मुलकि कुडमालि भाखि बाइसि का गठन हुआ जिनके ऐ अध्यक्ष बने । 1984 मे इनकी सक्रियता से वृहत्तर "आदिवासी कुडमि समाज का गठन हुआ तो ऐ उपाध्यक्ष बने । �कुडमि समाज को गर्व है कि लखीकांत जी ने समाज संस्कृति की गतीधारा मे त्वरण उत्पन्न किऐ । साथ ही साथ समाजीक बुराइयों को रोकने मे अहम भूमिका निभायी ।�कुडमालि समाज का दुर्भाग्य है कि असमय ही काल ने इन्हें अपने आग़ोश मे ले लिया ।मुतरुआर जी का आकस्मिक निधन 26-09-2012 को उनके पैतृक गॉव भंडरो, ज़िला बोकारो मे हुआ था । वे लम्बी बीमारी से भैयाग्रहस्त थे । उनके निधन से कुडमालि भाषा साहित्य संस्कृति को अपूर्णनीय क्षति हुई है । ऐ कुडमि समाज के देदीप्यामान पुरोधा थे ।
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