करम पर्व अनार्य मूल का पर्व: करम पर्व और कुड़मी समाज
करम पर्व अनार्य मूल का पर्व: करम पर्व और कुड़मी समाज
करम पर्व अनार्य मूल का पर्व है जो आदिकाल से झारखंड एवं झारखंड से सटे पश्चिम बंगाल एवं उड़ीसा में मनाया जाता है। आर्यों के आगमन के पूर्व ही यहां धान की खेती लहलहाती थी। इस पर्व में धान के पौधों की पत्तियों को ही फूल के रुप में “दहाई करम राजा“ बोलकर चढ़ाने की प्रथा है।
धान की पत्तियों को करम व्रत करने वाली लडकियां करम एकादशी (भादो शुक्ल पक्ष)के दिन खेतों से करम गीत गाते हुए संग्रह करती हैं। इसे फूल लड़हा विधान कहा जाता है। इस तरह यदि करम को कृषि आधारित पर्व कहा जाय तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
इतिहास बताता है कि कृषि के जनक कुड़मी ही हैं। अतः इसका प्रणयन कुड़मियों ने ही किया। यहां यह बताना जरूरी है कि स्वर्णरेखा, कंसावती, दामोदर नदी के तट पर आदिकाल में कृषि आधारित सभ्यता पल्लवित थी, जो सभी सभ्यताओं से प्राचीन थी। इस सभ्यता को आनंद मार्ग के संस्थापक और स्थानीय इतिहास पर विस्तृत विवेचना करने वाले श्री श्री प्रभात रंजन सरकार ने राढ़ सभ्यता की संज्ञा दी है और कहा, सभ्यता का आदि बिन्दु राढ़ है। उन्होंने कुड़मियों को राढ़ सभ्यता के हिल स्टेज का जनक माना है साथ ही बंगालियों को आदि पुरूष भी।
इतिहास बताता है कि कृषि के जनक कुड़मी ही हैं। अतः इसका प्रणयन कुड़मियों ने ही किया। यहां यह बताना जरूरी है कि स्वर्णरेखा, कंसावती, दामोदर नदी के तट पर आदिकाल में कृषि आधारित सभ्यता पल्लवित थी, जो सभी सभ्यताओं से प्राचीन थी। इस सभ्यता को आनंद मार्ग के संस्थापक और स्थानीय इतिहास पर विस्तृत विवेचना करने वाले श्री श्री प्रभात रंजन सरकार ने राढ़ सभ्यता की संज्ञा दी है और कहा, सभ्यता का आदि बिन्दु राढ़ है। उन्होंने कुड़मियों को राढ़ सभ्यता के हिल स्टेज का जनक माना है साथ ही बंगालियों को आदि पुरूष भी।
तंत्र और भारतीय आर्य सभ्यता के प्रवचन में उन्होंने स्पष्ट कहा है कि आर्यों के आगमन पूर्व यहां तीन गोष्ठियां आष्टिक, मंगोलीय और द्रविड़ निवास करती थी। द्रविड़ के अंदर उन्होंने कैवर्त बाग्दी, दुले, शबर, कुड़मी महतो और खेड़िया को माना है। सभ्यता के आदि बिन्दु राढ़ में उन्होंने कहा है कि कुड़मी महतो लोग राढ़ की मिटटी की संतान हैं तथा ये बाहर से आकर बसने वाले भी नहीं हैं। उन्होंने कहा है कि ये शिवाजी के वंशधर कैसे हो सकते हैं, क्योंकि ये तो आदि काल के आदि पुरूष हैं।
कृषि भित्तिक समाज व्यवस्था को कुड़मियों ने ही बनाया था क्योंकि हल के आविष्कारक ये ही हैं। चक्का का आविष्कार इन्होंने ही किया। खेतों को बनाकर खेती करने का कार्य भी इन्होंने ही शुरू किया था। मान्यता है कि कुड़मी महिलाओें ने ही भूमि पर बीजांकुर का पर्यवेक्षण किया था। अतः आज जो करम पर्व पर जावा की परंपरा (बांस की डालिया में बालू उठाकर विभिन्न बीजों को बोना और हल्दी पानी डालकर अंकुरण को अंजाम देना ) को जीवित रखना महिलाओं का ही काम है।
कृषि व्यवस्था के साथ-साथ समाज व्यवस्था की भी शुरूआत हुई। करम पूजा के दौरान करम व्रत करने वाली बालाओं (करमैतियों ) से पूछा जाता है -करम पूजा से तुम्हे क्या मिला ,वे कहती हैं- आपन धरम भाई एक करम, अर्थात मुझे अपना धर्म का पालन करना है और भाई का अपना कर्म करना है। कहानी में जरूरतमंद की सहायता एवं शुभ कार्य के लिए धन रत्न दान एवं बड़ों व गुरूजनों के साथ सम्यक व्यवहार आदि की भी शिक्षा दी जाती है। करम पर्व विधान को अनार्य पद्वति का अलिखित आचार शास्त्र कहा जाय तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। कुड़माली के बहुतायत करम गीत तथा छह ऋतु मास की काल गणना पद्वति तथा कांस (कासांई नदी ) का जिक्र प्रमाणित करता है कि करम पर्व के प्रणयनकर्ता कुड़मी ही हैं। 12 महीने के वर्ष गणना पूर्व यहां कृषि आधारित छह ऋतुओं का वर्णन मिलता है। अतः यहां की काल गणना पद्वति प्रचीनतम है।
The Mundas and their country में S.C.Roy ने The Karma में लिखा है − This festival is celebrated in certain munda families and has evidently been borrowed from their hindu naighbours.
यहां यह कहना प्रासंगिक है कि मुण्डाओं के पड़ोसी कुड़मी ही हैं तथा उनके सुख-दुख के सहयोगी भी। झारखंड की मूल जनजाति में कुड़मी और मुण्डा प्रजाति को प्राधान्य माना गया है । कुड़मी जनजाति हैं भले ही सूची में सूचीबद्व नहीं है, जिसे अंग्रेजों ने भी माना है।
वर्त्तमान परिप्रेक्ष्य में करम पर्व की प्रासांगिकता बढी है क्योंकि यह आपसी वैमनस्य और विद्वेष को खत्म करता है और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देता है।
वर्त्तमान परिप्रेक्ष्य में करम पर्व की प्रासांगिकता बढी है क्योंकि यह आपसी वैमनस्य और विद्वेष को खत्म करता है और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देता है।
( लेखक मौसम वैज्ञानिक, पर्यावरणविद एवं इतिहासकार हैं)
♦रतन कुमार महतो “सत्यार्थी“♦
करम पूजा के सभी नेग नियम के लिये कुड़मियों की भाषा कुरमाली में अलग-अलग गीत उपलब्ध हैं।
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