रघुवर अंकल plz हमारा पुराना वाला स्थानीय नीति ही हमे वापस कर दो...

रघुवर अंकल plz हमारा पुराना वाला
स्थानीय नीति ही हमे वापस कर दो...

#महज 5-6 बाहरी लोगों के द्वारा बनाया गया स्थानीय नीति भला हम बेरोजगार झारखंडियों के हित में कैसे हो सकता है।न कोई बहस न कोई डिबेट।रातों-रात इसे अमलीजामा पहनाकर इस सवेदनशील मुद्दे को यूंही घास-मूली की तरह लागु कर देने के पीछे का मकसद कहिं हम झारखंडियों के अधिकार को छिनना तो नही है।

#झारखण्ड के मात्र 13 आदिवासी बहुल जिलों का सीट आरक्षित करने का मकसद कहिं शेष बचे 11 जिलों की नौकरियों का दरवाजा बाहरियों के लिए खोलने से तो नही है।

#बिकाऊ मीडिया में ये ऐड दिलाना की अब झारखण्ड में बाहरी लोगो की बहाली मुश्किल होगी क्योंकि यहाँ नौकरी करने के लिए झारखण्ड का स्थानीय भाषा जानना जरुरी होगा लेकिन आपने बड़ी चालाकी के साथ स्थानीय भाषा के साथ-साथ यूनिवर्सल लैंग्वेज हिंदी और इंग्लिश का भी विकल्प रख दिया तो फिर बाहरी अभ्यर्थियों को आप कैसे रोक पाएंगे।क्या आप झारखण्ड की जनता को ये बताने का कष्ट करेंगे की ऐसा किस साजिश के तहत किया गया।

#यहाँ के नौकरियों में झारखंडी अभ्यर्थियों की कम से कम बहाली हो इसके लिये प्रतियोगिता परीक्षा को जटिल करने के साथ-साथ पेपरों की संख्या 4 तक बढ़ा दी गयी।क्या ये सत्य नही है?

#क्या ये सत्य नही है खतियान के अलावे कई ऐसे अन्य आसान विकल्प देना जिससे की झारखण्ड में निवास करने वाला हर बाहरी बड़े आसानी से खुद को झारखण्ड का स्थानीय सिद्ध कर सके के पीछे आपका उदेश्य बाहरी वोट बैंक को साधना रहा है।

~ऐसा करने से पहले आप यह कैसे भूल गए की बीजेपी को सत्ता दिलाने वाली झारखण्ड की 85 फीसदी मूलवासी जनता जिस दिन अपनी औकात में आ गयी तो फिर ये 15 फीसदी बाहरी आबादी बीजेपी की सत्ता को नही बचा पायेगी।

#झारखंडी जन आकंक्षाओं के विपरीत स्थानीय नीति और प्रतियोगिता परीक्षाओं को त्रुटिपूर्ण बनाने का मकसद कहिं झारखंडी जनता को धधकती आग में जलाकर  राजनीती रोटी सेकने का मकसद तो नही है आपकी।

(पिछले लोकसभा एवं विधानसभा में बीजेपी को जिताने के लिए जी- तोड़ मेहनत करने वाला झारखण्ड का एक आम बेरोजगार युवा)

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