इतिहासकारों की उपेक्षा का शिकार झारखण्ड की कुड्मी जनजाति ?

इतिहासकारों की उपेक्षा का शिकार झारखण्ड की कुड्मी जनजाति ??
देश के स्वतंत्रता आन्दोलन से लेकर झारखण्ड अलग राज्य आन्दोलन तक किसी भी संघर्ष में कुड्मी समुदाय का योगदान अन्य समुदायों से कहीं कम नहीं रहा है l भारत में अंग्रेजों के खिलाफ पहला संगठित चुआड़ विद्रोह 1769 में कुड्मी समाज के शहीद रघुनाथ महतो के नेतृत्व में झारखण्ड के जंगलमहल क्षेत्र में शुरू हुआ था l इसके बाद विद्रोह की आग पातकूम, बड़ाभूम, धालभूम, मिदनापुर, गम्हरिया, सिल्ली, सोनाहातु, बुण्डू, तमाड़, रामगढ़ आदि जगहों पर फैल गयी l लेकिन अंग्रेजों के चाटुकार इतिहासकारों ने साजिश के तहत इस विद्रोह को इतिहास में उपयुक्त स्थान नहीं दिया l उसी तरह फूट डालो और राज करो की निति अपनाते हुए अंग्रेज इतिहासकारों ने 1832 के कोल विद्रोह को कोल-कुड्मी रंजिश का रूप देने की साजिश की l जबकि सच्चाई ये है कि कोल विद्रोह अंग्रेजों के सामंतवादी व्यवस्था के खिलाफ था, जहाँ सामंत कुड्मी नहीं मुसलमान और सिख जमींदार थे l कोल विद्रोह का तात्कालिक कारण भी यही था कि विद्रोह के नायक सुरगा मुंडा की पत्नी को जफ़र अली नामक एक मुस्लिम जमींदार उठा कर ले गया था l उसी तरह भारत छोडो आन्दोलन के दौरान सबसे पहले मानभुम जिला के मानबाजार थाना के सामने 30 सितम्बर 1942 को तिरंगा फहराने वाले वीर शहिद गोविंद महतो एवं वीर शहीद चुनाराम महतो को इतिहास में जगह तक नही दिया । कुड्मी समाज का इतिहास ऐसे अनेकों वीर शहीदों की कुर्बानियों से भरा है जो इतिहासकारों की उपेक्षा का शिकार हुए हैं l
अलग झारखण्ड राज्य आन्दोलन में भी कुड्मी समाज का योगदान अन्य समुदायों से कहीं ज्यादा है l झारखण्ड आन्दोलन को धार देने के लिए परम आदरणीय विनोद बिहारी महतो ने शिबू सोरेन और ए. के. रॉय के साथ मिलकर झारखण्ड मुक्ति मोर्चो की स्थापना की l कोयलांचल का हीरा कहे जाने वाले शहीद शक्तिनाथ महतो और झारखण्ड के मसीहा शहीद निर्मल महतो ने अपने खून से झारखण्ड की पवित्र धरती को लाल किया l किसानों-मजदूरों को उनका हक दिलाने के लिए अजीत महतो, धनञ्जय महतो और न जाने कितने शहीदों ने अपने सीने पर गोलियां खायी तब जाके झारखण्ड अलग राज्य गठन का सपना साकार हुआ l लेकिन शिबू सोरेन ने झामुमो पर कब्ज़ा करके बड़े कायदे से सभी बड़े कुड्मी नेताओं को पार्टी से किनारे कर दिया और झारखण्ड अलग राज्य आन्दोलन में कुड्मियों के योगदान को मटियामेट कर दिया l
इतनी कुर्बानियां देने के बावजूद भी कुड्मी समाज हमेशा चाटुकार नेताओं और इतिहासकारों की साजिश का शिकार हुआ है l दक्षिणपंथी इतिहासकारों ने कुड्मियों को शिवाजी महाराज का वंशज बताया वहीँ, बी. पी. केशरी और लालमुनी प्रसाद जैसे झारखंडी साहित्याकारों ने कुड्मियों का परिचय सदान सामंत के रूप में दिया l जबकि एच एच रिजले के 'ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ बंगाल' में साफ उल्लेख किया गया है कि छोटानागपुर के कुड़मी द्रविड़ प्रजाति के आदिवासी समुदाय के लोग हैं। 1931 तक आदिवासी समुदाय के रूप में चिन्हित कुड्मी को एक साजिश के तहत 1951 में अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल नहीं किया गया l इसके पीछे मुख्य रूप से दो शक्तियां काम कर रही थी एक आरएसएस और दूसरी कैथोलिक सोसाइटी l 1946 के बंटवारे के बाद आरएसएस चाहता था कि भारत हिन्दू राष्ट्र बने l इसलिए उसने मुस्लिमों और ईसाईयों को छोड़कर शेष आदिवासियों को हिन्दू धर्म में लाने की साज़िश रची जिसमे उसने अखिल भारतीय क्षत्रीय कुर्मी महासभा को शामिल कर लिया l इससे पहले महासभा देश के सभी कुर्मियों के लिए क्षत्रिय स्टेटस की मांग कर चुका था l झारखण्ड के भोले-भाले कुड्मी आदिवासी उनकी साजिश को समझ नहीं पाए जिसके कारण झारखण्ड के कुड्मियों को अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर होना पड़ा l दूसरी तरफ, कैथोलिक सोसाइटी ने हमेशा सरना आदिवासियों को कुड्मियों के खिलाफ भड़काया l इसके पीछे मिशनरीज की ये खुन्नस थी कि तमाम कोशिशों के वाबजूद कुड़मी जनजाति के बीच इनकी घुसपैठ नहीं हो पाई l इसी कारण चर्च ने कुड्मियों और अन्य आदिवासियों के बीच दरार पैदा करने की साजिश की, जिसमे कि वे कुछ हद तक सफल भी हुए l इसी का परिणाम है कि कल तक कोल-कुड्मी, माझी-महतो भाई-भाई का नारा बुलंद करने वाले आज कुड्मी को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की बात पर आमने-सामने आ जाते हैं l
झारखण्ड, बंगाल और ओडिशा का आदिवासी कुड्मी समाज आज फिर अनुसूचित जनजाति स्टेटस की मांग को लेकर आन्दोलन कर रहा है l आन्दोलन की व्यापकता को देखकर आरएसएस और मिशनरीज के होश उड़ गये हैं l मिशनरीज को डर सता रहा है कि कुड्मियों को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने से आदिवासी के नाम पर ईसाईयों को मिल रहा नाजायज आरक्षण का लाभ ख़त्म हो जायेगा l दूसरी तरफ, आरएसएस को इस बात का डर है कि कहीं कुड्मी अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिल गया तो झारखण्ड में वो अपने एजेंडे का विस्तार नहीं कर पायेगा l इसीलिए दोनों ही कुड्मियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलने से रोकने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं l आज वक़्त का तकाजा है कि सरना आदिवासियों को झारखंडी कुड्मियों की मांग का समर्थन करना चाहिए, तभी झारखंडियों के जल, जंगल और जमीन की रक्षा हो पायेगी l

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