शहीद अजीत धनंजय अमर रहे।
झारखण्ड आन्दोलन के कुड्मी शहीदों की अमर गाथा...
21 अक्टूबर 1982 का वो काला दिन झारखण्ड राज्य के इतिहास में खून से लिखा जायेगा जिस दिन ईचागढ़ प्रखंड के मुख्यालय तिरुलडीह में सुखाड़ राहत, कमरतोड़ महंगाई, भ्रष्टाचार सहित अलग झारखण्ड राज्य की मांग को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां बरसाई l इस गोलीकांड में दो युवा शहीद हो गए l एक चांडिल प्रखंड के कुरली ग्राम के अजीत महतो और दुसरे ईचागढ़ प्रखंड के आदरडीह गाँव के धनञ्जय महतो l
जब ये घटना घटी उस समय झारखण्ड अलग राज्य आन्दोलन अंगड़ाई ले रहा था l आन्दोलन की आग सत्ता के गलियारों से निकल कर जन-जन तक पहुँच चुकी थी l किसान-मजदूर, युवा छात्र सभी इस आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर भाग ले रहे थे l उसी दौरान सन 1982 में झारखण्ड में भीषण अकाल पड़ा l जिससे दक्षिणी बिहार (आज का झारखण्ड) के सभी जिले बुरी तरह प्रभावित हुए l लोगों के सामने पेट भरने तक की समस्या उत्पन्न हो गयी l इस विकट परिस्थिति का नाजायज लाभ उठाते हुए जमाखोरो और कालाबाजारियों ने खाने-पीने के सामानों ने बेतहाशा वृद्धि कर दी l इस आपदा की स्थिति पर काबू पाने और अकाल पीड़ित लोगों को राहत पहुँचाने में बिहार की तत्कालीन जगन्नाथ मिश्र सरकार विफल साबित हुई l इससे जनता के बीच भयंकर आक्रोश फ़ैल गया l जगह-जगह पर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन होने लगे l इसी क्रम में 21 अक्टूबर 1982 को ईचागढ़ प्रखंड के तत्कालीन मुख्यालय तिरुलडीह में धरना-प्रदर्शन का कार्यक्रम रखा गया था l धनञ्जय महतो और अजीत महतो के नेतृत्व में सैंकड़ों की संख्या में युवा प्रखंड मुख्यालय पहुंचे और प्रशासन के सामने 21 सूत्री मांग रखी जिनमे सूखा प्रभावितों को आवश्यकता के अनुसार समय पर राहत सामग्री उपलब्ध कराना, जमाखोरों-कालाबाजारियों पर कारवाई, खाने-पीने की चीजों के दाम में कमी, सरकारी कार्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार का खत्म और अलग झारखण्ड राज्य का निर्माण जैसी मांगे शामिल थी l इसी बीच वहां सुरक्षा में लगे पुलिसकर्मियों ने बिना किसी आदेश के ही फायरिंग शुरू कर दी l इस गोलीबारी में धनञ्जय महतो और अजीत महतो शहीद हो गये l इस गोलीकांड की राज्य समेत देश भर में व्यापक निंदा हुई और इसने झारखण्ड अलग राज्य आन्दोलन को और तेज कर दिया l
इतनी कुर्बानियों के बाद झारखण्ड अलग राज्य का गठन हुआ, पर न सत्ता परिवर्तन हुआ न व्यवस्था परिवर्तन l कल भी सत्ता शोषक वर्गों के हाथ था और आज भी वही शासन कर रहा है l झारखण्ड आन्दोलनकारियों को मिली है तो बस मायूसी और जिल्लत l शहीद धनञ्जय महतो के बेटे उपेन महतो ने बताया कि उनका परिवार आज भी मिटटी के बने कच्चे मकान में रहता है l शहीद के नाम पर उनके परिवार को आजतक कोई सरकारी सुविधा नहीं मिली है और न हीं किसी तरह की सम्मान या प्रशस्ति पत्र दिया गया है l शहीद परिवार के वंशज होने के कारण उन्हें सरकार की ओर से तरह-तरह के आश्वासन मिले, पर आज तक उनपर अमल नहीं हुआ l झारखण्ड अलग राज्य बनने के बाद 2007 में तत्कालीन शिक्षा मंत्री बंधू तिर्की घर आकर शहीद परिवार से मिले l मंत्री जी ने उपेन जी के सारे प्रमाण पत्र लिए और उन्हें अपने विभाग में नौकरी दिलाने का वादा किया, पर वो पूरा नहीं हुआ l इसके बाद 2009 में मुख्यमंत्री शिबू सोरेन ने घोषणा की थी कि शहीद परिवार के आश्रितों को सरकारी नौकरी दी जाएगी l पर वो घोषणा भी घोषणा ही रह गयी l इसके कारण शहीद परिवार के वंशज खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं l
अरुण महतो बानुआर
Comments
Post a Comment