बांदना (सोहराय) परब :
बांदना (सोहराय) परब :
विविध व विशिष्ट आदि संस्कृति से परिपूर्ण झारखंड एक वृहद् सांस्कृतिक धरोहर का प्रदेश है। झारखंडी कृषिजनमानस के लोग आदिकाल से ऐसे कई त्यौहार मनाते आ रहे हैं, जो पूर्णत: कृषि एवं प्रकृति पर ही आधारित हैं व जिनका महत्व अद्वितीय है। उन्हीं त्यौहारों में से एक है कार्तिक अमावस्या को मनाया जाने वाला 'बांदना (सोहराय)' परब। यह परब मूलत: पशुधन के सम्मान, सुरक्षा और सुस्वास्थ्य के कामना का परब है। इस परब के दौरान उनसे किसी भी तरह का कोई काम नहीं लिया जाता है एवं उनकी विशेष देखभाल, आदर सत्कार व बंदन किया जाता है।
बांदना (सोहराय) परब की सुगबुगाहट यहां के आदिम अधिवासी लोगों में करम परब के समाप्त होेने के बाद से ही शुरू हो जाता है। सभी कोई अपने घर-दुआर व गहाइल की लेसा-मुदा एवं साफ सफाई कर चकचकाकर रखते हैं। आदिम जनजाति के आदि परंपरा व सामाजिक शासन व्यवस्था के अनुसार गांव के महतो, मुंडा या मांझी के देखरेख में इस परब का अनुष्ठान किया जाता है। गांव के पांच लोगों के मतामत से नौ, सात, पांच या तीन दिन पहले से गाय, गरू, बाछुर, काड़ा, मइस के सींग में तेल मखाने का रिवाज शुरू किया जाता है।
नेगाचार के हिसाब से यह परब कार्तिक अमावस्या के एक दिन पहले से पांच दिनों तक मनाया जाता है। पहले दिन 'घाउआ', दूसरे दिन अमावस की शाम को 'गठ पूजा' और रात में धिंगवानी/दिजुआनि/जाहलिबुला के माध्यम से जागरन, तीसरे दिन गहाइल (गरइआ) पूजा, चौथे दिन बुड़ही बांदना (बरद खूंटा) एवं अंतिम पांचवें दिन गुंड़ी बांदना के रूप में मनाया जाता है।
बांदना परब के पहले दिन यानि अमावस के पहले दिन 'कांचि दुआरि' देने का विधान है, जिसमें सेहरेइ/टुड़ि/मंड़दा घास का व्यवहार किया जाता है। इस दिन को 'घाउआ' कहते हैं। रात भर गहाइल घर में घी के दीये जलाये जाने का विधान है। घर घर में घाउआ जलाके लोग सेहरेइ गीत गाते हैं। दूसरे दिन यानि अमावस के दिन गांव के लोग लाया, देहरी या पाहन के साथ शाम को गोधुली बेला में गठान टांड़ जाते हैं। देहरी दिन भर निर्जल उपवास रहकर गठ पूजा करते हैं। गठ पूजा के बाद जिसका गाय या गरू पूजा किये गये अंडे को फोड़ता है, उसका विशेष सम्मान किया जाता है एवं रात को उसी के घर से धिंगवानी का शुभारंभ किया जाता है। रात भर ढोल, धमसा, मांदल के थाप पर अहिरा गाते हुए घर-घर जाकर गाय-गरू को जगाया जाता है।
तीसरे दिन शाम को घर के बाहर कुलहि मुड़ा से लेकर आँगन तक चउक पुराते हैं। सभी अपने-अपने गहाइल घर में 'गरइआ पूूजा' करते हैं। आँगन में तुलसी ढिप के पास हाइल-जुआइल को रखकर पूजा करते हैं। गरइआ पूजा के दौरान स्वयं एवं अपनी चल-अचल संपत्ति, पशुधन व गांव की सुरक्षा एवं शांति के लिए नौ देवी देवताओं की आराधना की जाती है। जिसमें गराम, धरम, बसुमाता, गसांयराइ, नाजि-लिलअउरि, गाइ गरइआ, मइस गरइआ, डिनि ठकुराइन एवं बड़अपहाड़ की विधिपूर्वक आराधना की जाती है। गहाइल पूजा खत्म होने के बाद घर के किसी कोने में बुड़हा-बुड़ही की आराधना करते हैं।
चौथे दिन बुड़हि-बांदना में 'बरद खुँटा' होता है। इस दिन घर के मालिक-मालकिन उपवास रहते हैं। मालिक खेत से धान सिंस लाकर सभी गरू-काड़ा के लिए मड़अइर गांथते हैं। मालकिन नये सूप में नया धान, अरवा चावल, दुब घास, धुप धुना आदि सजाकर रखती है। दोपहर के पहले चउक पुरा करते हैं एवं चउक पुरा होने के बाद ही गाइ-बरद को घर के अंदर प्रवेश कराते हैं, तत्पशचात सभी गाइ, बरद, काड़ा, मइस को तेल माखाकर रंग से सजाते हैं। मालकिन तुलसी चउड़ा में रखे मअड़इर की पूजा करके मालिक को देती है और मालिक सभी पशुधन को उसे पहनाते हैं। उसके बाद उनके पांव धोकर निमछाते व चुमान-बँदन करते हैं। शाम को अपने-अपने दुआइर के कुलही में खूँटा गाड़कर गरू-काड़ा को बाँधते हैं। फिर गांव के सभी छोटे-बड़े मिलकर ढोल-मांदइर बजाते हुए नाचते-गाते हुए नीचे टोला से ऊपर और ऊपर टोला से नीचे टोला तक तीन बार उन्हें भिड़काते/खेलाते हैं। अंतिम दिन गुंड़ि बांदना के रूप में मनाते हैं। इस दिन बांझिन गाय को पूर्व दिन बरद भिड़काये गये खूंटा में बांधकर भिड़काते हैं। इस तरह से पांच दिन का बांदना(सोहराय) का महापरब हर्षोल्लास के साथ समाप्त होता है।
प्रसेनजीत महतो काछुआर
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