अपनी_संस्कृति_अपनी_पहचान

आज  जब  हम  अपने पर्व  त्योहार  को  देखता हुॅ  तो  दुख  लगता  है
कभी  अगहन संक्रान्ति  से  पुस  संक्रांति तक उल्लास उमंग  और  टुसु  गीत  से  हाट  बजार  गांव  घर मे मादल की  थाप  और  भावमय प्रेम  रसो से  सरोवर  गीत  की मधुर  आवाज  से वातावरण गुजमान  रहता  था--
आज  सिर्फ  एक  दो  दिन  सिर्फ  खानपान  मे  ही  सीमित होते  जा  रहा  है ना  मांदर  की  आवाज  ना  लोगो  या  नवपीढी लोगो  के  मुह  से  एक दो  ही  टुसु  गीत ''---
परिस्थिति  इतना  तक  वततर हो  चुका  है  कि  हम   हमारे ससकृतिक गीत  गाने  को  लज्जा  का अनुभव  और  गानेबाले को हीन  दृष्टि से  देखते  हुए  मुर्ख  और  प्राचीन काल  का  समझते  है  जिस  रफतार से  परिस्थिति  बदल  रही  है लगता  है  हमारे  पीढी के  बाद  टुसु  पर्व  क्या  सोहराय  क्या  सरहुल  क्या  इनके  लिऐ  भी  गुगल  सर्च  करेगे---
पर  पछताना तब  पड़ेगा  जब  हमे कही  अपने समाज  राज्य  का  होने  के  बावजूद हमारे  यहा  की  संस्कृति  रीति  नही  जानने  के  कारण  कही  बेइज्जती कार  सामना  करना पड़ेगा--
पर  हम  उस  समय  बहुत  आगे  निकल  चले  जाऐगे  और  तब  तक  हमारी  संस्कृति  विलुप्त  होने  के  कागार  पर पुहच चुकी  होगी--
आज  क्या  हो  रहा  है  हमारे  क्षेत्र  मे  बाहरी  पर्व  त्योहार  का  क्रेज बड़ता  जा  है  हम  भी  उनके  प्लेटफार्म  दे  रहे मान  रहे कर भी  रहे  है
और  जब  हमारे  पर्व  त्योहार  की  आती  है  हाथ  पीछे  कर  देते  है  घर  मे  दुबके  रहते  है  उसे  मतालो  का  पर्व  कहकर  उनसे  अपने  अपने  बच्चो  को  दुर करते  है --
एक  बात  है जो  खुशी अपनो  से  अपने  पर्व  त्योहार  से  समाज के लोगो  आसपास  के  समुदाय  के लोग से  और  मातृभूमि से  जुड़ाव  राज्य के लोगो के साथ सम्मिलित होकर अपने  पर्व  त्योहार को  मानने  से  है वह  आनन्द  कही  नही  मिलेगा  ,कही  नही  मिलेगा --
#अपनी_संस्कृति_अपनी_पहचान

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