टुसू पर्व: टुसु परब
टुसू पर्व
झारखंड आदिवासी कुड़मी समाज की ओर से
झारखंडी महापर्व 'टुसु परब' के पावन अवसर पर सभी
झारखंडियों को बांउड़ी (14 जनवरी), मकर संक्रांति
(15 जनवरी), आखाइन जातरा व नव वर्ष (16 जनवरी,
01 माघ) एवं टुसु परब की हार्दिक शुभकामनाएं।
ज्ञातव्य हो, कि प्रकृति पूजक झारखंडियों के सभी
पर्व त्योहार प्रकृति तथा कृषि पर ही आधारित हैं,
यथा 'करम-परब' पेड़-पौधों के महत्व, सृजन और भाई-
बहन के पवित्र प्रेम का प्रतीक, 'बांदना' पशुधन के
महत्व का परब, उसी तरह 'टुसु' अन्न/फसल (धान) के
महत्व का परब है।
" झारखंड का महापर्व 'टुसु' का माहव्यापी आयोजन
मकर संक्रांति के दिन समाप्त होता है। इस दिन बच्चे,
युवा, बुढ़े सभी महिला-पुरूष पास के नदी टुसु-चौड़ल
लेकर जाते हैं। वहां टुसु को विदाई दी जाती है और
स्नान कर "पुसपिठा" खाते हैं। वर्तमान में टुसु के बारे में
सटीक जानकारी नहीं रहने के कारण आम जनमानस में
कई भ्रांतियां फैल गई है। कोई कहते हैं, कि टुसु
काशीपुर के राजा की पुत्री थी, तो कोई टुसु को
किसी कुड़मी जमींदार की साहसी कन्या के रुप में
चित्रित करते हैं। परंतु काशीपुर राजघराने के रिकॉर्ड
में ऐसी किसी कन्या का बंगाल के इतिहास गाथाओं
में कहीं कोई जिक्र नहीं पाया गया है। अतएव मुगल
साम्राज्य के समय टुसु एवं भादु नामक दो बहनों के
किसी हिंदू समाज के घर में जन्म लेने और धर्म संकट में
पड़कर टुसु का अपने अस्तित्व की रक्षार्थ आत्महत्या
करने की कथा भी बिल्कुल ही निराधार एवं मनगढ़ंत
है।
तो 'टुसु' है क्या?
वास्तव में अलिखित इतिहास की झारखंडी सभ्यता
संस्कृति के अनेक अमूल्य धरोहर मिटते गये हैं, पर जो
अभी भी बचे हैं, वो इसलिए कि उन्हें पर्व के रुप में
जनजीवन का अभिन्न अंग बनाकर रखा गया है।
दरअसल, सदियों से चौतरफा सांस्कृतिक आक्रमणों
की मार से असली झारखंडी संस्कृतियां लगभग मिट
गई या उनका कायांतरण हो गया है, जिससे इन
त्योहारों के मूल भाव को समझना काफी कठिन हो
गया है। फिर भी शोध करते-करते कई के मूलभाव स्पष्ट
हो चले हैं। इसी संदर्भ में 'टुसु' के बारे में यह स्पष्ट हुआ
है, कि टुसु न तो कोई राजकन्या थी और न जमींदार
की बेटी। यह दरअसल यहां के कृषिजीवी जनमानस
की अन्नरुपी "मातृशक्ति" थी, जिसे 'डिनि-टुसुमनि'
कहा जाता है। आदिकाल से जब हमारे पुरखों ने अन्न
उगाकर जीवनयापन करना आरंभ किया, तभी से
उन्होेंने यह महसूस किया, कि जिस धरती माता के
कोख से उत्पन्न अन्न के द्वारा सृष्टि का स्वतः
संचालन होता आ रहा है तथा मानव जीवन पुष्पित-
पल्लवित हो रहा है, उस प्रकृति की मातृशक्ति की
आराधना करके ही मानव अपनी संतति की रक्षा कर
सकता है। इसी के तहत खेतों से अन्न के घर आने और
इससे जीवन संपन्न होने के प्रतीक स्वरुप 'डिनि-
टुसुमनि' की आराधना एक माह पर्यंत करने का
विधान है। इस अवधि में कृषक-बालाएं इनको अपनी
संगी मानती हैं, जिसे पुनः अगले वर्ष आने को कहते हुए
जलरुपी ससुराल विदा कर दिया जाता है।
अतएववास्तव में 'टुसु' झारखंडी संस्कृति की
मातृशक्ति का जीवंत प्रतीक है। कुड़मी जनजाति के
आदि संस्कृति के अनुसार जब धान खेत में रहता है, तब
यह शक्ति "धान" कहलाती है, यही जब पकने के बाद
घर पहुँचती है, तब यह "डिनि" कहलाती है। डिनि को
अगहन संक्रांति के दिन घर लाकर आनुष्ठानिक ढंग से
प्रतिष्ठित किया जाता है। डिनि जिरान के बाद
पहला पूस को उसी 'धान देवी' या 'डिनि माञ' को
टुसु के रूप में घर में प्रतिष्ठित किया जाता है, तथा
पूरा पूस महिना फूल चढ़ाकर पूजा आराधना किया
जाता है, गीत गाया जाता है। अतः टुसु किसी
मानव या जन्म-मृत्यु से बंधी कोई देवी नहीं है, बल्कि
यह सृजनशीलता का प्रतीक स्वरूप एक प्राकृतिक
शक्ति की पुजा है। -
समाज इसी संदर्भ में 'टुसु'
के बारे में यह स्पष्ट हुआ है, कि टुसु न तो कोई
राजकन्या थी और न जमींदार की बेटी। यह दरअसल
यहां के कृषिजीवी जनमानस की अन्नरुपी
"मातृशक्ति" थी, जिसे 'डिनि-टुसुमनि' कहा जाता
है। आदिकाल से जब हमारे पुरखों ने अन्न उगाकर
जीवनयापन करना आरंभ किया, तभी से उन्होेंने यह
महसूस किया, कि जिस धरती माता के कोख से
उत्पन्न अन्न के द्वारा सृष्टि का स्वतः संचालन
होता आ रहा है तथा मानव जीवन पुष्पित-पल्लवित
हो रहा है, उस प्रकृति की मातृशक्ति की आराधना
करके ही मानव अपनी संतति की रक्षा कर सकता है।
इसी के तहत खेतों से अन्न के घर आने और इससे जीवन
संपन्न होने के प्रतीक स्वरुप 'डिनि-टुसुमनि' की
आराधना एक माह पर्यंत करने का विधान है। इस
अवधि में कृषक-बालाएं इनको अपनी संगी मानती हैं,
जिसे पुनः अगले वर्ष आने को कहते हुए जलरुपी ससुराल
विदा कर दिया जाता है। अतएव, वास्तव में 'टुसु'
झारखंडी संस्कृति की मातृशक्ति का जीवंत प्रतीक
है। कुड़मी जनजाति के आदि संस्कृति के अनुसार जब
धान खेत में रहता है, तब यह शक्ति "धान" कहलाती है,
यही जब पकने के बाद घर पहुँचती है, तब यह "डिनि"
कहलाती है। डिनि को अगहन संक्रांति के दिन घर
लाकर आनुष्ठानिक ढंग से प्रतिष्ठित किया जाता
है। डिनि जिरान के बाद पहला पूस को उसी 'धान
देवी' या 'डिनि माञ' को टुसु के रूप में घर में
प्रतिष्ठित किया जाता है, तथा पूरा पूस महिना
फूल चढ़ाकर पूजा आराधना किया जाता है, गीत
गाया जाता है। अतः टुसु किसी मानव या जन्म-
मृत्यु से बंधी कोई देवी नहीं है, बल्कि यह सृजनशीलता
का प्रतीक स्वरूप एक प्राकृतिक शक्ति की पुजा है।
- द्वारा, महतो स्पोर्टिंग क्लब गजपुर,सोनुआ, प सिहंभुम, झारखण्ड ,८३३१०३
tusu festival is very important for kudmi community in west bengal and jharkhand read more about tusu parab tusu song and tusu mela
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