पिछले 65 सालों से केन्द्र और राज्य सरकार कुड़मी समुदाय को सिर्फ और सिर्फ छलने का काम कर रही है। आदिवासी_कुड़मी_समाज
हम लेके रहेंगे - अपना हक
हम लड़के लेंगे - अपना हक
हमें देना होगा - हमारा हक
हम छीन के लेंगे - अपना हक
हम लेके रहेंगे - अपना हक
#आदिवासी_कुड़मी_समाज
पिछले 65 सालों से केन्द्र और राज्य सरकार कुड़मी समुदाय को सिर्फ और सिर्फ छलने का काम कर रही है। वो चाहती तो संविधान के अनुच्छेद 342 के अंतर्गत छोटानागपुर (तत्कालीन) के टोटेमिक (गुस्टिधारी) कुड़मी/कुरमी (महतो) जनजाति को कबका अनुसूचित जनजाति की सूचि में शामिल कर चुकी होती, जिसके तहत अन्य जनजातियों को भी शामिल किया गया था (1931 के प्रीमिटिव ट्राइब सूची के आधार पर) और चूंकि हमारी मांग कोई नया इन्क्लूजन का मामला नहीं है, बल्कि हम थेे और छूट गये हैं। मगर पिछले 65 सालों से हमें टीआरआई के बहाने घुमाया जा रहा है। हम आदिवासी (आदिम निवासी/मूलनिवासी) हैं, हमारी भाषा, सभ्यता, संस्कृति, परंपरा, रीति-रिवाज सभी कुछ इसके प्रमाण हैं और इसीलिए 1950 तक जनजाति की सूचि में शामिल थे। मगर 1950 में एक बेहद गहरे साजिश के तहत जनजातियों की संख्या कम करने और कुड़मियों की जमीनों को सीएनटी से हटाकर कब्जा करने/हथियाने के मकसद से बेहद चालाकी से जानबूझकर एसटी सूचि में शामिल करने से छोड़ दिया गया।
नियमत: हमारे लिए किसी टीआरआई रिपोर्ट की कोई जरूरत नहीं, मगर फिर भी बार बार हमसे टीआरआई रिपोर्ट की मांग की जाती है और उल्टा सीधा लिखकर भेज दिया जाता है। ऐसे हालात में यदि फिर से सर्वे होती है, जो कि शायद बहुत जल्द ही होगी, तो हमें उसके लिए भी पूरी तरह से तैयार रहना पड़ेगा और उसके लिए हमें निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखना होगा.. (भटके हुए लोग विशेष रूप से ध्यान दें, समझें, दूसरों को भी समझाएं और आत्मसात करें।)
1.) हमारी भाषा - 'कुड़माली' है।
2.) हमारी संस्कृति - आखाइन, सिझानअ (पअथिपुजा), भअगता (गाजअन), सरहुल, रहइन, आसाढ़ी (आमावती/जांताल), गराम पुजा, बारिपुजा, करम, जितिया, बांदना (सअहराई), टुसु इत्यादि हैं, जो (सभी) प्रकृति और कृषि पर आधारित हैं (ना कि होली, दीवाली, छठ इत्यादि)।
3.) हम प्रकृतिपूजक हैं (मूर्तिपूजक नहीं)।
4.) हम गराम, धरम, बूढ़ाबाबा (हड़ शिव), महामाय (सती माता), बड़अ पहाड़, छटअ पहाड़ के पूजक हैं (दुर्गा, काली, गणेश, लछमी, सरस्वती, विश्वकर्मा, विष्णु, राम, कृष्ण, हनुमान इत्यादि केे नहीं)।
5.) और इसलिए हमारा धर्म है - 'सरना'।
6.) हमारे रीति रिवाज और परंपराओं में 'लाया' प्रथा/व्यवस्था है (ब्राह्मण प्रथा/ब्राह्मणवाद नहीं)।
7.) हमारे जन्म से लेकर विवाह और मृत्यु तक अपने नीति-नियम/नेग-नेगाचार/विधि-विधान (Customary Laws) हैं।
* याद रखें, ये सब कुछ सिर्फ एसटी स्टेटस के लिए ही नहीं, वो तो हमारा संवैधानिक और जन्मसिद्ध अधिकार है ही, ये हमारे पहचान और अस्तित्व के लिए भी है। खुद को आदिवासी कहने या कहलाने में शर्म नहीं, बल्कि गर्व महसूस करें, क्योंकि ये दुनिया की सबसे प्राचीन और महान प्रजाति है और आदिवासी संस्कृति दुनिया की सबसे महान संस्कृति (प्रमाणित) है..प्रसेन..।
(निवेदन : आपके एरिया में कहीं भी कभी भी कोई कुड़मी सम्मेलन/मीटिंग/बैठक हो, तो समय निकालकर वहां जरूर उपस्थित हों और समाज के बुद्धिजीवियों का अमृत वचन जरूर सुनें..प्रसेन..)
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