देश के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलनकारी चुआड़/चुहाड़ (कुड़मी) विद्रोह
दिनांक 05 अप्रैल 2016 को सुवर्णरेखा निर्मल गेस्ट हाउस, जमशेदपुर में झारखंड मूलवासी अधिकार मंच की ओर से देश के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलनकारी चुआड़/चुहाड़ (कुड़मी) विद्रोह के महानायक क्रांतिवीर शहीद रघुनाथ महतो के 238वीं शहादत दिवस पर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि सांसद श्री विद्युत वरण महतो जी ने कहा, "जब 1765 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा सर्वप्रथम तत्कालीन बंगाल के छोटानागपुर के जंगलमहल जिला में मालगुजारी वसूलना शुरू किया गया, तब अंग्रेजों के इस षडयंत्रकारी तरीके से जल जंगल जमीन हड़पने की गतिविधियों का सन् 1769 ई. में कुड़मी आदिवासियों द्वारा रघुनाथ महतो के नेतृत्व में सबसे पहला विरोध किया गया और ब्रिटिश शाशकों के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंका गया। जब अंग्रेजों ने पूछा, ये लोग कौन हैं, तो उनके पिट्ठू जमींदारों ने घृणा और अवमानना की दृष्टि से उन्हें चुआड़ (बंगाली में एक गाली) कहकर संबोधित किया, तत्पश्चात उस विद्रोह का नाम 'कुड़मी विद्रोह' के स्थान पर 'चुआड़ विद्रोह' पड़ा।
उन्होंने आगे कहा, कि इतिहासकारों ने शहीद रघुनाथ महतो के साथ न्याय नहीं किया। वे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से मिलकर शहीद रघुनाथ महतो की जीवनी पाठ्य पुस्तकों में शामिल करने की मांग करेंगे एवं उन्हें प्रथम स्वतंत्रता सेनानी घोषित कराने के लिए लोकसभा में आवाज उठाएंगे। साथ ही उन्होंने ये घोषणा भी किया, कि अगले साल से इस शहादत दिवस के अवसर पर विशाल कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा।"
विशिष्ट अतिथि झारखंड आंदोलनकारी श्री सी आर मांझी ने कहा, कि "शहीद रघुनाथ महतो के जीवनी के अध्ययन के बाद ऐसा प्रतीत होता है, कि उन्होंने बाबा तिलका माझी के पहले क्रांति शुरू की थी। उन्होंने ये भी कहा, कि सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक कुड़मी भी पहले आदिवासी की सूचि में शामिल थे, मगर किन्हीं कारणों से अ..ज.जा. की सूचि में शामिल होने से छूट गये। अब वापस शामिल होने के लिए उन्हें पूर्व की ही भांति आदिवासी परंपरा, रीति रिवाज, संस्कृति, रहन सहन व पूजा पद्धति को अपनाना होगा।"
विशिष्ट अतिथि झारखंड आंदोलनकारी सह पूर्व सांसद श्री कृष्णा मार्डी ने पहले की ही तरह गरजते हुए कहा, कि "अपने शहीदों को कैसे सम्मान दिलाना है, ये हमें अच्छे से पता है, वो हम दिलाकर ही रहेंगे। उन्होंने माझी और महतो के बीच पुराने रिश्ते का भी जिक्र किया। उन्होंने आदिवासी और मूलवासी (कुड़मी) को एक मानते हुए इस दरार को खत्म करने की बात पर विशेष जोर डाला।"
झारखंडवासी एकता मंच के मुख्य संयोजक आस्तिक महतो ने कहा, कि "कुड़मी समाज अपने इतिहास को जानें और समझें, अन्यथा भविष्य बर्बाद होने में देर नहीं लगेगी। उन्होंने कहा, कि कुड़मियों को नाच गान और मनोरंजन वाले प्रोग्रामों के अलावे सामाजिक प्रोग्रामों में भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेना चाहिए।
उन्होंने आगे कहा, कि झारखंड वनांचल आंदोलनकारी चिह्नितिकरण आयोग द्वारा शहीद निर्मल महतो के झारखंड आंदोलनकारी होने और शहीद का दर्जा दिए जाने पर सवाल उठाए जा रहे हैं। वो होते कौन हैं ऐसा कहने वाले, उन्हें क्या मालूम कि झारखंड के लिए किन किन लोगों ने क्या क्या बलिदान दिया है!"
झारखंड आदिवासी कुड़मी समाज के केंद्रीय संगठन सचिव प्रसेनजीत काछुआर ने कहा, कि "हमें शहादत दिवस मनाने के साथ साथ उनके बताए रास्ते पर भी चलने की जरूरत है। उनका जुल्म, अत्याचार, अन्याय व शोषण के खिलाफ लड़ने के आदर्शों को अपनाते हुए उनका अनुसरण करने की आवश्यकता है। पिछले साल इंदर सिंह नामधारी ने झारखंड अलग होने के पीछे किसी भी आंदोलन के हाथ नहीं होने की बात कही थी, तो हमने उसी दिन उसका पुतला जलाकर जबर्दस्त विरोध किया था। आज अगर कोई झारखंड के मसीहा वीर शहीद निर्मल महतो के आंदोलनकारी और शहीद होने पर सवाल उठाने की हिम्मत करता है, तो समाज इसका मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार रहे।
उन्होंने आगे कहा, कि ये कलम और कागज का युग है, शहीदों को स्थापित करने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है। वैचारिक रूप से मजबूत बनें, दोतरफा विचारधाराओं से बचें, कट्टर बनें, तभी समाज में परिवर्तन ला सकते हैं। अपने मूल भाषा, सभ्यता, संस्कृति, धर्म, परंपरा, रीति-रिवाजों को दिल से अपनाएं और उनका सख्ती से पालन करें, तभी समाज के उद्देश्य को पूरा कर सकते हैं।"
झाआकुस के सचिन महतो ने कहा, "जब मंजिल एक है, तो रास्ते अलग अलग क्यों? इधर उधर से घूम फिर कर उल्टे सीधे रास्ते से जाने के बजाय सीधे रास्ते से जाएं, तो मंजिल जल्दी मिलेगी।"
सभा को इनके अलावे विस्थापित मुक्ति वाहिनी के कुमार दिलीप, जिला परिषद् सदस्य स्वपन महतो, प्रो. गुरूपदो महतो आदि ने संबोधित किया। सभा में झाआकुस के तपन महतो, प्रकाश महतो, धीरेन महतो इत्यादि, कुड़मी सेना के शैलेन्द्र महतो, लालटू महतो, विरेन महतो इत्यादि के अलावे सुमित महतो, संतोष महतो, महावीर महतो, जोयराम महतो, विकास महतो इत्यादि विभिन्न संगठनों के सैकड़ों लोग उपस्थित थे।
सभा की अध्यक्छता झारखंड मूलवासी अधिकार मंच के मुख्य संयोजक हरमोहन महतो ने किया। सभा के अंत में निष्कर्ष के बाद उन्होंने घोषणा किया, कि जमशेदपुर में शहीद रघुनाथ महतो के मूर्ति अनावरण के लिए डीसी को पत्र लिखकर उचित स्थान की मांग की जाएगी।
धन्यवाद ग्यापन प्रणव महतो ने किया।
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"हमें शहादत दिवस मनाने के साथ साथ उनके बताए रास्ते पर भी चलने की जरूरत है। शहीद रघुनाथ महतो के जुल्म, अत्याचार, अन्याय व शोषण के खिलाफ लड़ने के आदर्शों को अपनाते हुए उनका अनुसरण करने की आवश्यकता है। पिछले साल इंदर सिंह नामधारी ने झारखंड अलग होने के पीछे किसी भी आंदोलन के हाथ नहीं होने की बात कही थी, तो हमने उसी दिन उसका पुतला जलाकर जबर्दस्त विरोध किया था। आज अगर कोई झारखंड के मसीहा वीर शहीद निर्मल महतो के आंदोलनकारी और शहीद होने पर सवाल उठाने की हिम्मत करता है, तो समाज इसका मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार रहे।
ये कलम और कागज का युग है, शहीदों को स्थापित करने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है। वैचारिक रूप से मजबूत बनें, दोतरफा विचारधाराओं से बचें, कट्टर बनें, तभी समाज में परिवर्तन ला सकते हैं। अपने मूल भाषा, सभ्यता, संस्कृति, धर्म, परंपरा, रीति-रिवाजों को दिल से अपनाएं और उनका सख्ती से पालन करें, तभी समाज के उद्देश्य को पूरा कर सकते हैं।"
- प्रसेनजीत महतो काछुआर
(केंद्रीय संगठन सचिव, झारखंड आदिवासी कुड़मी समाज)
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