मैं आदिवासी।

मैं आदिवासी

मैं जंगलों में रहता, पहाड़ों मैं रहता। मैं मैदानों, नदी घाटियों मै रहता।शहरों मै भी अब आशियाने मेरे।
मैं आदिवासी।

न मै गिरीजन, न मै वनवासी। न ही मैं अनुसूचित जनजाति।
मै हू इस देश का मूलनिवासी
मैं आदिवासी ।

न मैं व्यापारी, न मै कारोबारी न मै अवसरवादी, न मै व्यक्ति वादी ।
सबके हितों की पूर्ति करता ।
मैं आदिवासी ।

न मै हिन्दू न मै मुसलमान ।
न सिक्ख, न ईसाई।
प्रकृति का हू उपासक, मानवता मेरा धर्म ।
मैं आदिवासी ।

स्त्री का मै सम्मान करता, स्त्री को मै समानता देता ।
बेटी को न मै बोझ मानता।
बेटे- बेटियो मे न कोई अन्तर जानता ।
मैं आदिवासी ।

प्रकृति से जो लेता प्रकृति को वो लोटाता।
प्रकृति की छतृ- छाया मे रहता, प्रकृति का मे सम्मान करता ।
प्रकृति का न मै सन्तुल बिगाड़ता।
मैं आदिवासी।

न दहेज हत्या, न भ्रूण हत्या। न मै कोख की तहकीकात कराता ।
ईश्वर के आर्शिवाद का न मैं सफाया करता ।
मैं आदिवासी ।

आक्रमणकारियों से लड़ा मै, अंग्रेजो से लड़ा मै।
देश की रक्षा के लिये सदैव तत्पर रहा मै।
अब व्यापारियो, नेताओं और व्यवस्था से लड़ता।
मैं आदिवासी ।

पत्थर को तराश कर हथियार बनाया मैंने ।
एकलव्य सा तीर चलाया मैंने अब किताबों को पड़कर, अपने अधिकारो के लिए लड़ता ।
मैं आदिवासी ।

आजादी की लड़ाई लड़ी मैंने, अंग्रेजो की गोलियाँ खाई मैंने।
तोपों ने किया सिना मैरा छलनी।
इतिहास ने भुला दिया मुझको
मैं आदिवासी।

जंगल छिना पहले, अब जमीन पर डाका डाल रहे।
बना रहे हिन्दू-ईसाई, भुला कर संस्कृति मेरी ।
समझ रहा हू मै, मिटाना चाहते है हस्ती मेरी ।
मैं आदिवासी ।

किये जुल्म सभी ने मुझ पर, हर वर्ग ने किया शोषण ।
बहुत सहा मैंने, फिर भी ना कुछ कहा मैंने।
युवाओं के कंधों पर बोझ मेरा, हुंकार रहा अब युवा मैरा
मै आदिवासी।

अब तक सहता आया, अब तक दबता आया।
अब संघर्ष की राह पर चलना है।
चीर कर इस अंधेरे को जाग रहा।
मै आदिवासी ।
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जयआदिवासी🙏
जय आदिवासी

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