पृथ्वी दिवस पर बधाई और हार्दिक शुभकामनाएँ !!

पृथ्वी दिवस पर बधाई और हार्दिक शुभकामनाएँ !!

झारखंड राज्य के पावन भूमि पर पैदा हुये हम झारखंडी मुलवासी सदियों से ही प्रकृति के साथ गहरा संबंध रहा है , यहाँ की जलवायु, पहाड़-पर्वत, नदी-झरना ,लहराते खेत-खलिहान यहाँ के कण-कण से हमारा रिश्ता-नाता है ! यह हमारा आदिवासी कुड़मी समुदाय पूर्ण रूप से इस जल-जंगल और जमीन पर आश्रित होकर अपनी आजीविका का साधन उपलब्ध करता है ! आज भी हमारे मुल निवासी ग्रामीण क्षेत्रों के 70 % लोग इसी पर निर्भर हैं , महुआ, साल, पिलाय, केंन्दु, साल के पत्तों से बना (थाली-कटोरे समान) खाली-दना ,केंद के पत्ते , जड़ी-बुटी औसधियाँ एवं जलावन की लकड़ी से लेकर कीमती पलंग-फरनिचर बनाने के लिए हमारा रोजगार का साधन रहा है ! हमारी हर जरूर इसी से पुरा भी होता हैं पर अब धीरे-धीरे दैनिक कल-कारखानों के निर्माण से जंगलों की अंधाधुंध कटाई शुरू हो गया है जो प्रदूषण का मुख्य कारण बन गया है जिससे हमारा प्रकृति का संतुलन बिल्कुल ही बिगड़ता जा रहा है ! ये निश्चित तौर पर हमारे आने वाली पीढ़ियों के लिये अभिशाप सा बनकर सामने आयेगा क्योंकि अब हरियाली के नाम पर कुछ ही क्षेत्र बाकी रह गया है जिसका भी निकट भविष्य खतरे में है ! कल-कारखानों, गाड़ी-मोटर एवं विभिन्न मशीनें से निकलता विभिन्न प्रकार का विषैला धुँवा जिसे इन सीमित बचे पेड़ पौधे पुर्ण रूप से कार्बनडाईअँसाइड से आँक्सिजन में परिवर्तन करने में असमर्थ हैं यही वजह है कि अब इन्सानों की औसत उम्र घटते जा रहा है विभिन्न बीमारियाँ दिन व दिन घर करते जा रहें हैं लोगों में सहन शक्ति घटने लगा है न धूप सहन होता ना ठंड और न ही बारिश पर हमारे पूर्वज जिनके पास आज के तरह इतने सुबिधा नहीं था पर उन्हें इस मौसमों का कोई खास असर नहीं पड़ता था !

एक शोध से पता चला है कि हमारा प्राण वायु आँक्सिजन अगर 19% से कम हो जाये तो लोग घूंट कर मर जायेंगे ! यह दिन भी दूर नहीं क्योंकि अब पेड़-पौधे लगते तो नहीं पर कटते तो निश्चित रूप से है !!

अत: मेरा आप सभी से नम्र निवेदन है कि कम से कम साल में एक पेड़ अपने जन्म दिन पर अवश्य ही लगायें  एवं परिवार और अपने करीबी लोगों को भी प्रेरित करें इससे एक इन्सान कम से कम अपनी पुरी जिन्दगी में 70-80 पेड़ लगायेगा, अगर हर घर के हर सदस्य भी यही नियम को मान कर चलें तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हमारे राज्य एवं हमारे देश में कितनी आवादी हैं किस कदर  यह हरित क्रांति खुद व खुद देश भर में देखने को मिल सकता है ! धन्यवाद, जोहार
: उत्तम कुमार केसरिआर

Comments

Popular posts from this blog

बारह (12) मासे तेरह (13) परब

कुड़मि एक जनजाति

Kudumi Movement